Wednesday, November 5, 2014

वायुसेना को लाखों सलाम

श्रीनगर एयरपोर्ट पर थेपला खाते बचकर आए लोग।
( जन्नत में जल प्रलय - 52)
श्रीनगर में वायुसेना का एयरपोर्ट। यह श्रीनगर के सिविल एयरपोर्ट से लगा हुआ ही है। बाहर से दोनों का प्रवेश अलग-अलग है। पर अंदर से रनवे एक ही है। यहां पर वायुसेना की ओर से आपदा पीड़ितों के लिए इंतजाम चाक चौबंद थे।
जैसे ही हम हेलीकाप्टर से उतर कर वायुसेना के वेटिंग एरिया की ओर बढ़े वायुसेना के जवान सभी लोगों को थेपला का एक एक पैकेट दे रहे थे।

 थेपला गुजराती फास्ट फूड है जो हमें काफी पसंद है। इसके साथ अचार या जैम का छोटा सा पैकेट होता है। थेपला एक प्रकार की बेसन की बनी रोटी है जिसे यात्रा में साथ रखा जा सकता है। यह कई दिनों तक खराब नहीं होती। थेपला खाकर शरीर में थोड़ी ताकत आई। यहां फूड पैकेट में चावल भी मिल रहा था। पर शाम को मेरा चावल खाने का इरादा नहीं हुआ। वायुसेना के सैकड़ों जवान आपदा पीड़ितों की सेवा में तत्पर थे। यहां पानी की अनगिनत बोतलें मौजूद थीं। यानी खाने पीने की कोई कमी नहीं थी। यहां पर वायुसेना की एक कैंटीन भी थी जिसमें खाने पीने की वस्तुएं मिल रही थी।
बीमार लोगों की चिकित्सा के लिए डाक्टरों की टीम भी मौजूद थी। कई तरह की दवाएं मुफ्त में मिल रही थीं। राजभवन के हेलीपैड में शुरूआत के तीन दिन तो डाक्टर भी मौजूद नहीं थे। बाद में महज दो घंटे के लिए आर्मी के डाक्टरों की एक टीम आती थी।

वायुसेना के वेटिंग लांज में मोबाइल चार्चिंग और फ्री वाईफाई की सुविधा भी मौजूद थी। यहां तक की वायु सेना के अफसर अगर कोई अपने परिवार से बातें करना चाहता हो तो लोगों को अपना मोबाइल फोन सौंप दे रहे थे। मेरा स्मार्ट फोन बिल्कुल डिस्चार्ज हो चुका था। थोड़ी देर चार्ज करने के बाद मैंने पहला फोन माधवी को मिलाया और ये जानकारी दी की मैं श्रीनगर एयरपोर्ट पहुंच चुका हूं। इसी दौरान सासाराम से मां का फोन आया। मन भर आया, मैंने उन्हें बताया कि अब बचकर निकल आया हूं। जल्द ही दिल्ली पहुंच जाऊंगा। 
यहां मैंने देखा कि कर्नाटक सरकार ने एक पोस्टर लगाया था जिसमें अपने राज्य के फंसे लोगों के लिए श्रीनगर और दिल्ली के हेल्पलाइन नंबर लिखे थे। पर बाकी राज्यों ने आगे बढ़कर इस तरह के इंतजाम नहीं किए थे। हम मुसीबत से निकल कर आ गए थे पर पीछे का मंजर याद करके रोना आ रहा था।

श्रीनगर के वायुसेना एयरपोर्ट से वायुसेना के विमान पीड़ित लोगों को अवंतीपुरा, जम्मू, पठानकोट, चंडीगढ़ और दिल्ली तक पहुंचा रहे थे। मैंने दिल्ली के फ्लाइट के लिए सूची में अपना नाम लिखवा दिया। पर थोड़ी खोजबीन पर पता चला कि दिल्ली की फ्लाइट कल दोपहर तक उड़ेगी। उस सूची में भी मेरा नाम 421 नंबर पर था। अगर वायुसेना का बड़ा डकोटा विमान भी मिलता तो उसमें 400 लोग आते हैं। शायद इसमें मेरा कल दोपहर तक भी नंबर नहीं आता। दिल्ली के सीधे विमान के लिए 18 घंटे का इंतजार करना था। एक बार फिर खुले आसमान के नीचे। तभी ये जानकारी मिली की चंडीगढ़ के लिए विमान तुरंत उडान भरने वाला है। उसमें जगह भी है। मैं तुरंत जाकर चंडीगढ़ वाले लाइन में लग गया। आपदा पीड़ितों की सेवा में लगे वायुसेना के नौजवान कैप्टन सबको भरोसा दिला रहे थे कि हम सबको घर पहुंचाएंगे, किसी को भी चिंता करने की जरूरत नहीं है। लोगों के लिए जरूरी सूचनाओं की उदघोषणा माइक से भी हो रही थी।

वायुसेना के अफसरों का शालीन व्यवहार
वायुसेना के तमाम अधिकारी आपदा पीडितों से बड़े ही अदब से पेश आ रहे थे। उनकी हर समस्या का समाधान करने के लिए तत्पर थे। कोई अगर ये पूछ दे कि दिल्ली का विमान कितने घंटे बाद मिलेगा तो वे उन्हें बड़े प्रेम से धैर्य रखने की सलाह देते हुए कहते थे, अब आप यहां पर आ गए हैं न आपको घर तक पहुंचाना हमारी जिम्मेवारी है। वायुसेना प्रमुख अरूप राहा की ओर से निर्देश थे कि जब तक आखिरी आदमी का रेस्क्यू न कर लिया जाए हमारा आपरेशन जारी रहेगा। पूरे वायुसेना एयरपोर्ट पर मौजूद किसी भी वायुसेना के अफसर के चेहरे पर गुस्से का भाव तो देखने को ही नहीं मिल रहा था। अगर सैलाब पीड़ित आक्रोश में बात करें तो भी वे उनके मुस्कुराकर जवाब देते। मैं सोच रहा हूं कि वायुसेना के अफसरों जैसा ही व्यवहार का प्रशिक्षण आर्मी या बीएसएफ के लोगों को क्यों नहीं दिया जाता है। 

आपरेशन सहायता -2
- 45 विमान  और हेलीकपाप्टर उड़ रहे थे वायुसेना के राहत कार्य में । 
- आपरेशन सहायता 2 नाम दिया गया था श्रीनगर की इस आपदा से बचाव के लिए 
- वायुसेना ने न सिर्फ एमआई 17 बल्कि अपने सभी अत्याधुनिक विमान भी इस राहतकार्य में झोंक दिए थे।


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