Monday, November 10, 2014

कौनो तरह से जान बच गइल इहे ढेर बा...

( जन्नत में जल प्रलय57 )
बड़ी संख्या में यूपी और बिहार के मजदूर श्रीनगर के बाढ़ में फंसे थे। इनमें से कई मजदूर परिवार जब अपने घर पहुंच गए तो लगा जैसे कि उन्हें नया जीवन मिल गया हो। प्रस्तुत है ऐसे ही एक समूह की दास्तां...

श्रीनगर के सैलाब में फंसे मजदूरों का दर्द
सेवरही। (कुशीनगर)  यूपी में नारायणी नदी की बाढ़ से बचने और अपनी तकदीर संवारने कश्मीर गए जवहीदयाल और अहिरौलीदान के लोगों को वहां झेलम और तवी नदी का कहर झेलना पड़ा। 10 दिनों तक कश्मीर में बाढ़ से जूझने के बाद मंगलवार की सुबह इनमें से आठ लोग किसी तरह अपने घर पहुंचे। वहीं 12 लोग अब भी वहां फंसे हैं। घर आए लोगों ने वहां की तबाही का जो मंजर बताया वह दिल को दहला देने वाला है।


मंगलवार को तरया थाने के एपी तटबंध के किनारे बसे जवहीदयाल गांव के दीनानाथ, पप्पू कुमार, गुड्डू, मनोज, कन्हाई और अहिरौलीदान के वीरेंद्र, साधू और अरविंद अपने घर पहुंचे। इन लोगों के चेहरे पर घर पहुंचने की जितनी चमक थी, उससे अधिक उस बाढ़ के खौफनाक मंजर का डर भी झलक रहा था। कश्मीर के श्रीनगर शहर के आसपास मजदूरी का काम करने वाले ये लोग जब मंगलवार की सुबह सेवरही के ट्रैक्सी स्टैंड पर उतरे तो इनके आंखों में आंसू छलक गए। जब इन लोगों से वहां के हालात के बारे में पूछा गया तो सभी का एक ही जवाब था - कौनों तरह से जान बच गईल इहे ढेर बा।

कन्हाई ने बताया कि हम लोग श्रीनगर के सालटेन चौराहा के पास रहकर मजदूरी करते थे। छह सितंबर की सुबह अचानक मोहल्ले में पानी की धारा बहने लगी। देखते देखते पानी घरों में घुसने लगा। पहले तो लगा कि कुछ देर बाद सब सामान्य हो जाएगा, लेकिन धीरे-धीरे पानी चढ़ता ही गया। पहले एक शाम तक पहली मंजिल पूरी तरह से डूब गई तो हम लोग दूसरी मंजिल पर पहुंच कर मदद की बाट जोहने लगे। वीरेंद्र ने बताया कि चार दिनों तक वे लोग भूखे प्यासे रह गए। पांचवें दिन सेना के जवानों की मदद से उन्हें बिस्किट और पानी मिला। तीन दिन पहले किसी तरह से निकल कर ये लोग पैदल करीब 40 किलोमीटर चलने के बाद सेना के शिविर के पास पहुंचे और वहां से सेना के हेलीकॉप्टर से उन्हें श्रीनगर एयरपोर्ट पहुंचाया गया।

नहीं मिला मजदूरी का एक रुपया भी - इन लोगों कहना है कि ये सभी लोग छह माह पहले वहां गए थे। मजदूरी का एक भी रुपया उन्हें नहीं मिला है, क्योंकि जिनके यहां उन लोगों ने काम किया था, उनका सब कुछ तबाह हो गया है। यहां तक की बैंकों और एटीएम सेंटरों पर पानी भरा हुआ है। कुछ साथी अभी भी अपनी मजदूरी पाने की उम्मीद में वहां रुके हैं। वापस आए लोगों का कहना था कि इनके गांव में हर साल मानसून आने के दौरान बाढ़ आती है। वास्तव में नारायणी नदी के बाढ़ के कहर से बचने के लिए ये लोग कश्मीर गए थे। पर वहां पर झेलम नदी का कहर इन्हें झेलना पड़ा।

( साभार - अमर उजाला, 17 सितंबर, कुशीनगर

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