Monday, October 20, 2014

राजभवन की ओर...उम्मीदों का सफर

( जन्नत में जल प्रलय - 35)

09 सितंबर 2014 - डल गेट से राजभवन। आठ किलोमीटर की दूरी। मेरे लिए आठ किलोमीटर पैदल चलना पीट्ठू बैग लेकर समान्य सी बात थी। पर अनादि और माधवी के लिए थोडा मुश्किल था। उस दौर में जब कुछ दिन से पेट मेंठीक से अन्न का दाना भी नहीं गया हो। पर चलना तो था ही। झेलम नदी से लगातार आए पानी के कारण कोनाखान रोड में कई जगह बड़े-बड़े गड्ढे हो गए थे। एक आटो रिक्शा और एक कार इस गड्ढे में समा गए थे। कई पुराने मकानों की दीवारें दरक गई थीं। हमारे होटल के पास एक कश्मीरी परिवार का छोटा सा एक मंजिला घर था। उस परिवार ने जरूरी सामान के साथ अपने घर की छत पर शरण ली थी। वे उसी छत पर स्टोव जलाकर अपने परिवार का खाना बना रहे थे। वहीं सो रहे थे और पानी घटने का इंतजार कर रहे थे।


तीन दिन पहले जिस चिनार बाग में मैं और अनादि सैर करके आए थे वह चिनार बाग पूरी तरह से डूबा हुआ था। हमेशा गुलजार रहने वाले डल गेट की सारी दुकानें बंद थीं। डल झील में तैरने वाले रंग बिरंगे शिकारे शांत थे। एक अजीब सी वीरानगी छाई हुई थी। अली भाई का शिकारा इस भीड़ में कहां है नहीं पता है। अली भाई का घर और परिवार सुरक्षित है कि नहीं इसका भी नहीं पता। डल लॉक गेट से होकर अभी भी झेलम का पानी डल झील में जा रहा है। जब पानी जाना रूकेगा तब डल झील का स्तर कम होना शुरू होगा। डल गेट से निशात बाग जाने वाली सड़क पूरी तरह पानी में डूबी हुई नजर आ रही है। दूसरी तरफ जे एंड के बैंक की ओर जा रही सड़क, मौलाना आजाद रोड पर अभी भी पानी जमा हुआ है। वहां कश्तियां चल रही हैं। जाहिर है कृष्णा ढाबा वाली सड़क भी डूबी हुई है।
डल गेट से हमारा रास्ता बदल जाता है। हम एक संकरे रास्ते से बाजार से होकर आगे बढ़ रहे हैं। हमारे समूह में बड़ी संख्या में महिलाएं हैं इसलिए हमलोग धीरे-धीरे चल रहे हैं।

आगे एक मस्जिद आती है। बाहर भीड़ है। मस्जिद की ओर से लोगों को चाय और हल्का फुल्का नास्ता बांटा जा रहा है। पर हमारी चाय पीने की कोई इच्छा नहीं है इसलिए हम आगे बढ़ते जाते हैं। आफताब वानी के परिवार के लिए श्रीनगर शहर जाना पहचाना है। सड़क पर वानी साहब के मित्र स्थानीय पत्रकार मिल जाते हैं।

वे बताते हैं कि पूरा श्रीनगर शहर तबाह हो चुका है। उन्होंने खुद अपना घर छोड़कर किसी दोस्त के घर में शरण ले रखी है। जब हमने बताया कि हमलोग राजभवन के हेलीपैड जा रहे हैं तो उन्होंने कहा कि वहां बहुत बड़ी भीड़ जमा है कई दिनों तक आपका नंबर नहीं आने वाला है। उनकी बातें सुनकर हमारे मन में निराशा बढ़ गई। पर हमारे पास आगे बढ़ते जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। हमारे आगे पीछे बड़ी भीड़ थी। हम अनादि का हाथ मजबूती से पकड़ कर आगे बढ़ रहे थे। भीड़ में बिछुड़ जाने का खतरा बना हुआ था।  



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