Saturday, October 25, 2014

खतरनाक सफर पर निकला वानी परिवार

( जन्नत में जल प्रलय - 40 )
राजभवन के हेलीपैड पर जुटी हजारों लोगो की भीड़ को देखकर आफताब वानी को लगा कि यहां से हेलीकॉप्टर से लिफ्टिंग में काफी वक्त लग जाएगा। 9 तारीख की रात राजभवन हेलीपैड पर जुटी भीड़ को देखकर वे आशंकित थे कि उनका नंबर कब आएगा। 10 तारीख को दोपहर तक अपनी बारी का इंतजार करने के बाद उन्होंने हेलीपैड से बाहर जाकर अपने रास्ते खुद तलाशने का फैसला लिया। आफताब वानी और गुलाम रसूल वानी के परिवार में कुल 12 सदस्य थे। इसमें दो बच्चे भी थे जिनकी उम्र 8 से और 11 साल की थी।

वानी जम्मू के पास राजौरी जिले के रहने वाले हैं। दोनों भाई कारोबार के सिलसिले में अक्सर श्रीनगर आते रहते हैं इसलिए ये श्रीनगर शहर उनके लिए जाना पहचाना है। मुश्किल घड़ी में उन्होंने मुश्किल फैसला लिया, शोपियां से होकर सड़क मार्ग से राजौरी जाने का। पर हेलीपैड छोड़ते समय मुश्किल घड़ी में दोस्त बने आफताब वानी और उनके बड़े भाई गुलाम रसूल वानी से मेरी मुलाकात नहीं हो सकी। बाद में फोन पर बातचीत होने पर उन्होंने अपनी यात्रा की दर्द भरी दास्तां सुनाई।

हेलीपैड से निकलने पर वे लोग एक बार फिर 8 किलोमीटर पैदल चलकर डल गेट इलाके में गए। यहां टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर से लाल चौक के आगे जाने के लिए उन्होंने एक नाव किराये पर ली। 3500 रुपये किराया दिया पर एक स्थानीय व्यक्ति ने गलत सलाह दे दी थी। पूरा परिवार आगे जाकर फंस गया। वे लोग 1200 रुपये देकर किसी तरह वापस डल गेट लौट आए। पैदल चलकर सारे लोग दुबारा राजभवन के पास स्थित आर्मी कैंप के करीब पहुंचे। 

यहां से टाटू ग्राउंड बछवारा क्षेत्र में दो किलोमीटर के करीब पानी में सफर करते हुए सारा परिवार पंथा चौक के पास पहुंचा। पंथा चौक हाईवे पर भी पानी जमा था। इस पानी से चलकर वे लोग बाईपास पहुंचे। यहां से 12 हजार रुपये में एक वाहन करके वे लोग पटन पहुंचे। पटन में फिर कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। पटन से किसी तरह 3000 रुपये देकर वे लोग अनंतनाग पहुंचे।
अनंतनाग से हीरपुरा का रास्ता 15 मिनट का है। पर रास्ते पर पानी जमा था। एक टैक्सी वाले ने गांव से होकर लंबे रास्ते से पहुंचाने के लिए 2500 रुपये लिए। हीरपुरा से पैदल चलकर सारे लोग पुलवामा पहुंचे। पुलवामा से फिर 4700 रुपये में गाड़ी तय कर शोपियां पहुंचे। वानी परिवार की काफी रिश्तेदारियां शोपियां जिले में है। इसलिए वहां लोगों की खूब खातिरदारी हुई। एक दिन रिश्तेदारों के घर गुजारने के बाद 13 सितंबर की सुबह के बार फिर सारा परिवार आगे के सफर के लिए चल पड़ा। लेकिन रास्ते में पता चला कि शोपियां से राजौरी तक की सड़क रास्ते में कई जगह बाढ़ की भेंट चढ़ चुकी है। एक सूमो किराये पर कर वे लोग डुबही तक पहुंचे। डुबही में इसी नाम की एक दरिया बहती है। 60 मीटर चौड़ी दरिया में तीन फीट गहरा पानी था। पर ये पानी पहाड़ों के ग्लेसियर का था, जो हाड़ को कंपा देने के लिए काफी था। आफताब वानी ने बारी-बारी से अपने दो भतीजों और कई महिलाओं को कंधे पर बिठाकर नदी पार कराया। नदी पार करने के बाद पूरा परिवार पैदल चलकर पीर गली पहुंचा। पीर गली कश्मीर के खूबसूरत स्थल में से एक है। यहां लंगर में पूरे परिवार को सब्ज चाय पीने को मिली तब थोडी राहत मिली।

पीर गली से से रेत की बजरी ढोने वाला एक टिपर मिला। टीपर पर चढकर पूरा परिवार चंडीमड़ पहुंचा। पीर गली से चंडीमड की दूरी 35 किलोमीटर है। वानी बताते हैं कि रास्ते में कई जगह सड़क 50 से 100 मीटर तक बह गई है। जहां तक नजर जाती है सिर्फ रेत और बजरियां दिखाई देती हैं। चंडीमड से वे लोग पैदल चलकर बफलियाज पहुंचे क्योंकि टीपर चंडीमड तक ही जा रहा था। बफलियाज से फिर सूमो तय किया और शाम तक राजौरी जिले के थाना मंडी पहुंचे। इस तरह श्रीनगर से जो सफर 10 घंटे में तय होना था उसे तीन दिन में तय कर घर तो पहुंच गए। पर इस सफर में 50 हजार रुपये से ज्यादा किराये में खर्च हो गए।

पुंछ जिले के बफलियाज से पीर की गली होते हुए शोपिंया तक का 84 किलोमीटर का रास्ता ऐतिहासिक मुगल रोड कहलाता है। यह जम्मू से श्रीनगर पहुंचने का वैकल्पिक रास्ता है। यह बनिहाल दर्रे की तुलना में ज्यादा ऊंचाई से होकर गुजरता है। तो वानी परिवार इसी ऐतिहासिक मुगल रोड से होकर गांव पहुंचा था। पर ये सड़क भी सैलाब के कहर से बदरंग हो चुकी थी।

मुझे लगता है कि वानी परिवार ने बहुत बड़ा खतरा मोल लेने वाला फैसला लिया था इस तरह से सफर कर घर पहुंचने का। अल्लाह का शुक्र है कि वे लोग महफूज घर पहुंच गए। पर घर पहुंचने पर बरबादी के और भी नजारे उनका इंतजार कर रहे थे।

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------ विद्युत प्रकाश मौर्य   vidyutp@gmail.com

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