Friday, November 7, 2014

शुरू हो चुकी थी मेरी तलाश...

( जन्नत में जल प्रलय - 54)
श्रीनगर के होटल रिट्ज की छत पर फंसे हम। चारों तरफ पानी से घिरे थे तीन दिन।
श्रीनगर के सैलाब में 7 दिन फंसे रहने के बाद 13 सितंबर की सुबह जब मैं दिल्ली पहुंचा तो दिल्ली में पटना से मेरे साले साहब आनंद रंजन जी मेरा कुशल क्षेम जानने पहले से ही पहुंच चुके थे। मेरी उनसे 7 सितंबर की दोपहर आखिरी बार बातचीत हुई थी। तब से उन्होंने हमारी तलाश शुरू कर दी थी। उन्होंने मेरे फेसबुक के कई मित्रों को मैसेंजर में संदेश डाल कर मदद की गुहार की थी। पर इसके बाद कुछ ही लोगों ने प्रतिउत्तर दिया था।


हालांकि कुछ उनके कुछ मेरे दोस्तों के प्रयास था कि मेरे श्रीनगर में फंसे होने की खबरें जी न्यूज, एनडीटीवी समेत कई चैनलों पर चल रही थी। मेरे कई दोस्त मुझे तलाशने और रेस्क्यू कराने का प्रयास कर रहे थे। हालांकि उनकी कोशिशें कामयाब तक नहीं पहुंच पायीं थी पर इतनी सदभवना के लिए उन सब लोगों का आभार, जिन्होंने आपदा की घड़ी में मेरे साथ इतनी आत्मीयता दिखाई। मुजफ्फरपुर से राजेश रंजन, पटना से सुनील झा (हिंदुस्तान), दिल्ली में भाई स्वंय प्रकाश, उमा शंकर सिंह, प्रेम प्रकाश, संजय मिश्र ( ब्यूरो प्रमुख, अमर उजाला) चंडीगढ़ में सुधीर राघव सभी अपनी ओर से कोशिश में लगे थे। पर संचार प्रणाली ठप्प होने के कारण मुश्किल आ रही थी।

माधवी 10 सितंबर की शाम श्रीनगर एयरपोर्ट पर पहुंची थीं, वहां पर उन्हें आजतक के संवाददाता पुरोहित मिले। माधवी ने उनसे गुजारिश की- मेरे पत्रकार पति हेलीपैड पर फंसे हैं, आप उनका रेसक्यू कराने में मदद करें। पर उनकी प्रतिक्रिया काफी उदासीन रही। माधवी और अनादि रात को डेढ़ बजे दिल्ली के पालम टेक्निकल एयरपोर्ट पर पहुंचे। वहां से वे हमारे मित्र संजय कुशवाह के घर नवादा मेट्रो स्टेशन के पास चले गए। दूसरे दिन माधवी और अनादि को मेरे भाई स्वंय प्रकाश मेरे फ्लैट पर लेकर आए। दिल्ली पहुंचने के बाद माधवी ने मेरे उन तमाम दोस्तों को एक क्रम से फोन करन शुरू किया जिनके नंबर उनके मोबाइल में दर्ज थे। पर माधवी को ये अंदाजा तो नहीं था इस घड़ी किसको फोन करना ज्यादा मददगार साबित हो सकता है।


आईआईएमसी के मेरे साथी और एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार उमाशंकर सिंह को मेरे श्रीनगर में फंसे होने की जैसे ही जानकारी मिली उन्होंने माधवी को फोन किया। उन्होंने बड़े अधिकार से कहा आपने सबसे पहले मुझे क्यों नहीं बताया। उमा श्रीनगर में तीन साल से ज्यादा वक्त गुजार चुके हैं। वे मेरी मदद कर पाने में सक्षम थे। रक्षा मंत्रालय में अधिकारी हमारे आईआईएमसी के सहपाठी प्रेम प्रकाश को भी मेरे बारे में जानकारी देर से मिली।

इस पूरी कवायद और कोशिशों के बीच हमारे कई ऐसे भी दोस्त थे जिन्होंने हमारी मदद को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई। पर एक पुरानी कहावत है कि आपदा की घड़ी में हित अनहित की पहचान हो जाती है। हमारे ऊपर आई आपदा ने हमें कई पाठ पढ़ाए और मुश्किल घड़ी में लड़ने की शक्ति भी प्रदान की। पर एक व्यवहारिक बात ये है कि हमें ऐसे लोगों के नाम और फोन नंबर की एक सूची तैयार कर अपने परिजनों को जरूर दे देना चाहिए जो आपदा की घड़ी में आपके मददगार हो सकते हैं। हो सकता है इसमें कुछ लोग मदद के लिए आगे न सकें पर भरोसा रखिए कुछ लोग जरूर कठिन घड़ियों में आपकी मदद करेंगे।

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