Saturday, October 18, 2014

नौ सितंबर की सुबह...एक और कोशिश

( जन्नत में जल प्रलय – 33)


नौ सितंबर 2014 की सुबह। होटल की पहली मंजिल डूबी हुई थी। पानी कम होने का संभावना नहीं नजर आ रही थी। पानी से घिरे होटल के बीच आज तीसरा दिन था। हमारे कुछ साथी नाव में बैठकर आज फिर बाहर सड़क पर गए। थोड़ा पानी घटने के बाद कोनाखान रोड पर आते जाते लोग दिखाई दे रहे थे। आफताब वानी भाई बाहर का माहौल पता करने के बाद लौटे। उन्होंने बताया कि ऐसा सुनने में आया है कि यहां से आठ किलोमीटर दूर स्थित राजभवन यानी राज्यपाल निवास से शहर में फंसे लोगों की हेलीकॉप्टर से लिफ्टिंग हो रही है। हम इस उधेड़ बुन में थे कि क्या इस होटल को छोड़कर जाना ठीक होगा। हेलीकॉप्टर से लिफ्टिंग में हमारी बारी कब आ सकेगी आदि मुद्दे पर विचार हो रहा था।

होटल में आज सुबह हमें नास्ता नहीं मिला। दोपहर में भी खाने का कोई इंतजाम नहीं था। दो दिन किसी तरह खाना बन पाया था 250 लोगों के लिए। पर अब गैस खत्म हो रही थी। एजाज भाई ने कहा हमारे पास कई सिलेंडर का स्टाक है पर वह जगह पानी से घिरी हुई है। वहां जाकर लाना मुश्किल है। एजाज भाई कह रहे हैं मैं किसी को भूखा नहीं रहने दूंगा। कोई न कोई इंतजाम जरूर करूंगा। वे बताने लगे श्रीनगर के लोग कई बार लंबे समय तक कर्फ्यू देखने के आदी हैं। इसलिए यहां लोगों के पास गैस सिलेंडर और राशन का स्टाक घरों में रहता है।  कर्फ्यू के दिनों में लोग राशन एक दूसरे से साझा करते हैं जिससे कोई परिवार भूखा न रहे। पानी थोड़ा उतरेगा तो मैं कहीं न कहीं से राशन और गैस का इंतजाम करके ले आउंगा। पर फिलहाल कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था।

इसी बीच सरस मेले में शामिल होने आए लोगों में से पंजाब से आए एक समूह के लोगों ने बाहर से लौटकर आने के बाद होटल छोड़कर जाने का मन बना लिया। वानी साहब के कमरे की खिड़की से उतर कर सड़क पर पानी में खड़ी नाव पर सवार होकर वे लोग चल दिए। एजाज भाई उन्हें जाने से रोक रहे थे। सरस मेले के ज्यादातर शिल्पी होटल छोडने के पक्ष में नहीं थे। एजाज भाई ने जाने वाले लोगों से कहा कि हमारे रजिस्टर में अपना नाम लिख दो ताकि हमारे पास ये रिकार्ड रहे कि 250 लोगों में से कौन-कौन चला गया। पर वे लोग बिना नाम लिखे ही चले गए।

बाकी बचे सरस मेले के शिल्पी में से ज्यादातर होटल छोड़कर जाने के पक्ष में नहीं थे। रामपुर के मसूद भाई सबसे पहले होटल छोड़ने के पक्ष में थे। वे 9  तारीख की सुबह ही बाहर निकल गए। मेरे साथ पत्नी माधवी और 9 साल के अनादि थे। इसलिए मैं वानी साहब के परिवार के साथ था। क्योंकि उनके समूह में भी भाभी जी और दो बच्चे थे। वानी परिवार हमारे संकट के साथी थे। इसलिए हमने तय किया था कि हम जहां जाएंगे साथ-साथ ही जाएंगे। वानी साहब के पास एक टेंपो भी था। जो हमारे लिए सहारा था। सड़क पर रात गुजारनी पड़े तो महिलाएं और बच्चे टेंपों के अंदर सो सकते थे। वह टेंपो हमें बारिश से भी बचा सकता था।

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