Friday, November 14, 2014

इस बरबादी से भी नहीं सीखा तो एक दिन कुछ नहीं बचेगा... ((आखिरी))

श्रीनगर में डल झील के किनारे हल्की बारिश के बीच।
( जन्नत में जल प्रलय 62 )
पहले 2005 में मुंबई फिर 2013 में उत्तराखंड और 2014 में कश्मीर में प्रकृति ने जल प्रलय का एक ट्रेलर दिखाया है। हम 1995 में प्रदर्शित हॉलीवुड की फिल्म वाटर वर्ल्ड को याद करें। केविन कास्टनर की इस विज्ञान फिल्म में उस हालात का लोगों को सामना करते हुए दिखाया गया है जब पूरी धरती पानी में डूबने लगती है। पर लगता है श्रीनगर में साल 2014 में इस जल प्रलय से हमने अभी सबक नहीं लिया है।
सैलाब के बाद भारत सरकार झेलम की धारा को श्रीनगर शहर से बाहर करने का प्रस्ताव पर विचार कर रही है। 30 सितंबर 2014 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के मुताबिक सरकार ने इस मामले में विशेषज्ञों से राय मांगी है। ये विचार जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के उस पत्र के बाद आया है जिसमें उन्होंने श्रीनगर शहर को भविष्य में सैलाब से बचाने के लिए झेलम के लिए एक वैकल्पिक चैनल बनाने पर विचार करने को लिखा है। इस मामले में केंद्र सरकार ने केंद्रीय जल आयोग के विशेषज्ञों से सलाह मांगी है। क्या कोई वैकल्पिक चैनल श्रीनगर शहर के बाहर से बनाकर शहर को भविष्य में बाढ़ से रोका जा सकता है। बारिश के दिनों में झेलम नदी के पानी को मोड़ने के लिए ऐसे वैकल्पिक चैनल बनाए जाने का प्रस्ताव बहुत पुराना है। इस पर 8500 करोड़ रुपये का खर्च आने का अनुमान है। हालांकि इस प्रस्ताव पर कभी बात आगे नहीं बढ़ सकी। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ऐसा कोई चैनल बनाकर हम छोटे मोटे बाढ़ से तो शहर को सुरक्षित कर सकते हैं पर जितना बड़ा सैलाब 2014 में आया, इससे निपटने के लिए कोई वैकल्पिक चैनल बनाना भी पर्याप्त नहीं होगा। 
वास्तव में ये प्रस्ताव बड़ा ही अव्यवहारिक है। नदियों के किनारे पहले इंसान ने शहर बसाया। नदी के डूब क्षेत्र पर कब्जा किया। उसके जल प्रवाह के सारे रास्ते बंद किए। अब संकट आया तो अपनी सुरक्षा के इंतजाम करने के बजाय नदी को ही वहां से हटाने के बारे में विचार कर रहा है। अगर झेलम ने कहर ढाया है तो इसमें झेलम का कोई कसूर तो था नहीं, हमने पानी के लिए रास्ते बंद कर डाले थे।

कहा जाता है कि कई हजार साल पहले पूरा श्रीनगर शहर की सतीसर नामक विशाल झील हुआ करती थी। अब इस इलाके में साढ़े 12 लाख से ज्यादा की आबादी रहती है। इस सैलाब से सबक लेकर हमें इस आबादी के सुरक्षित स्थल की ओर शिफ्ट करने के बारे में सोचना चाहिए। न की झेलम नदी की मुख्य धारा को ही शहर से बाहर ले जाने के बारे में। सरकार में इस प्रस्ताव पर विचार हो रहा है कि 8000 करोड़ से ज्यादा राशि खर्च करके झेलम नदी को शहर के बाहरी इलाके से गुजारा जाए। क्या इससे अच्छा ये नहीं होगा कि इतनी राशि खर्च करके राजधानी के सचिवालय और अन्य भवन ही सुरक्षित स्थानों पर बनाएं जाएं, और नदी को अविरल बहने दिया जाए।
राज्य  के बाढ़ नियंत्रण विभाग को नहीं मालूम की आपदा के असली कारण क्या थे। इतना सब कुछ गुजर जाने के बाद राज्य का बाढ़ नियंत्रण विभाग ये नहीं जान सका है कि ये सब कुछ हुआ कैसे। पढिए समाचार पत्र ग्रेटर कश्मीर में 29 सितंबर को प्रकाशित बाढ़ नियंत्रण विभाग के सचिव पवन कोटवाल का बयान-
हम अभी तक ये आकलन करने मे सफल नहीं हुए हैं कि 6-7 की दरम्यानी रात को क्या हुआ। झेलम में पानी का तेज बहाव आया जिसने नदी के किनारे बने बांध को तोड़ डाला। इसके बाद शहर दाहिनी तरफ से और पीछे की तरफ से बाढ़ में डूब गया।
...और अंत में मशहूर शायर अली सरदार जाफरी की रचना जो उन्होंने झेलम दरिया पर लिखी है...

झेलम का तराना

मानिंद जू ए ज़िंदगी शाम ओ सहर बहता हू मैं।
हर दम रवां, हर दम दवां, हर दम जवां रहता हूं मैं..
वादी में लहराता हुआ
सब्ज़ से इठलाता हुआ         
सौ पेच ओ खम खाता हुआ
हंसता हुवा गाता हुआ

मौजों की जुफें खोलता
क़तरों के मोती रोलता
माशूक़ा-ए-कश्मीरी के
पहलू में इतराता हुआ

खेतों के दामन में यहां
बागों के साए में वहां
अपनी शराब-ए-नब के
सागर को छलकाता हुआ

मानिंद जू ए ज़िंदगी शाम ओ सहर बहता हूं मैं
हर दम रवां हर दम दवां, हर दम जवां रहता हूं में...

( अली सरदार जाफरी )


जन्नत में जल प्रलय की ये आखिरी कड़ी है। हजारों लोगों ने 62 कड़ियों कश्मीर के संस्मरण और रिपोर्ताज को पढ़ा और प्रतिक्रियाएं दीं उनका आभारी हूं। 


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