Thursday, October 30, 2014

सेवा में जुटे बीएसएफ के जवान

( जन्नत में जल प्रलय - 45)

10 सितंबर 2014 – राजभवन के हेलीपैड में मौजूद सैकड़ो बीएसएफ के जवान पूरी मुस्तैदी से आपदा पीड़ितों की सेवा में जुटे थे। इस टीम में कई राज्यों के बीएसएफ के ऐसे जवान थे जिनकी अपने घर भी कई दिनों से बात नहीं हो सकी थी। श्रीनगर की टेलीफोन सेवाएं बंद हो जाने के बाद उनके फोन भी नहीं काम कर रहे थे। एक जवान ने कहा, कई दिनों से घर नहीं बात कर पाया हूं, पता नहीं घर वालों को ये भी मालूम हो कि हम सुरक्षित हैं या नहीं। कई दिनों से मोबाइल फोन तो खिलौना बने हैं। पर आपदा पीड़ितों की मदद करके थोड़ी दिल को तसल्ली हो रही है। बीएसएफ के एक अधिकारी राम कुमार बड़े स्नेह भाव से जगह जगह पीड़ितों से मिलते हैं और उनकी हर संभव मदद की कोशिश करते हैं।

बच्चों के लिए दूध - भले ही बीएसएफ का एक अधिकारी आपदा पीड़ितों के दर्द का मजाक उड़ा रहा हो पर बाकी सभी जवान लोगों का दर्द खूब समझ रहे हैं। 10 सितंबर की दोपहर में राहत सामग्री में मिल्क पाउडर के कुछ पैकेट आ गए हैं। बीएसएफ के जवानों ने बड़े से कड़ाह में पानी को खौलाया और मिल्क पाउडर से दध तैयार किया। इस दूध को लेकर वे लोग पूरे हेलीपैड क्षेत्र में जहां कहीं भी बच्चे थे उनको बांटना शुरू किया। भूख से तड़प रहे बच्चों के लिए ये दूध राहत बनकर आया। पूरे परिसर में मौजूद बच्चों को दूध मिल गया तो यही दूध उन्होंने बुजुर्गो और बड़े लोगों को भी बांटना शुरू कर दिया। दूध बनाने का ये क्रम 11 और 12 सितंबर को भी जारी रहा। लोगों की सेवा में जुटे इन बीएसएफ के जवानों को बार बार सलाम।

खाने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं - पूरे परिसर में मौजूद लोगों के लिए पर्याप्त खाने पीने की सामग्री मौजूद नहीं थी। पर शायद बीएसएफ, सेना और जम्मू कश्मीर पुलिस के बड़े अधिकारी इस सच्चाई से अपने अफसरों को अवगत कराते तो यहां और भी खाद्य सामग्री उपलब्ध कराई जा सकती थी जिससे लोगों को थोड़ी राहत मिल पाती। पर शायद वे ऐसा नहीं कर पा रहे थे।

बाहर भी भूखे लोग कर रहे हैं इंतजार - सिर्फ हेलीपैड का इलाका ही नहीं बल्कि हेलीपैड के बाहर हजारों लोग सड़कों पर बैठकर अंदर आने का इंतजार कर रहे हैं। उन बाहर बैठे लोगों को खाने में कुछ नहीं मिल पा रहा है। जो लोग प्रवेश द्वार के पास खड़े हैं इस इंतजार में कि कभी गेट खुलेगा और वे हेलीपैड परिसर में प्रवेश कर जाएंगे, वे भी भूख से तड़प रहे हैं। इन भूखे लोगों को देखकर बीएसएफ के जवानों को दया आ जाती है। वे गेट से बाहर कुछ केले कुछ बिस्कुट तो कभी दूध भिजवा देते हैं। इन सामग्री को लूटने के लिए लोगों में होड लग जाती है।


हम भिखारी बन गए हैं - कभी बिस्कुट या नमकीन का पैकेट बंटने वाला होता है तो लंबी लाइन लग जाती है। दो बार मेरे हाथ में आए हुए नमकीन के पैकेट किसी और ने झटक लिया ...और मैं हाथ मलता रह गया। इस तरह छोटे से पैकेट के लिए लाइन में खुद को लगा हुआ देखकर...मन ही मन खूब रोना आया...हमारा क्या हाल बन गया है...आखिर हम भिखारी ही तो बन गए हैं...


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