Monday, November 24, 2014

बहुत याद आता है गांव का छठ

हर साल दिल्ली के रेलवे स्टेशनों पर छठ से पहले घर जाने के लिए रेलगाडियों में मारामारी होती है। मैं किसी साल अब छठ में गांव नहीं जा पाता। पर गांव का छठ तो जेहन में बसा हुआ है। गांव के पूरब मे बहता सोन नहर। नहर के किनारे पीपल का पेड़। पेड़ की छांव में बने घाट पर होता छठ। सारा गांव नहर के किनारे जुट जाता था। शाम को अर्घ्य देने के बाद हमलोग घर वापस नहीं जाते थे शहर की तरह। सारी रात वहीं गुजरती थी। सुबह का इंतजार और छठ के गीत।


कोई नाच गाना या संगीत कार्यक्रम नहीं, माई और चाची, दादी के कंठ से फूटता था छठ का गीत। एक समूह गाते गाते रूक गया तो दूसरा समूह शुरू हो जाता था। हमारी ड्यूटी थी दीपक में तेल भरने की। सारी रात जलता रहता था दीया। उम्मीदों का दीया। आस्था का दीया। गुनगुनी ठंड में नहर के किनारे सारी रात। किसी की भी आंख में नींद नहीं। प्रातः अरुण के आगमन का इंतजार। सुबह होते ही चाचा गाय का दूध लेकर पहुंच जाते। सुबह का अर्घ्य तो दूध से दिया जाता है ना। 


एक बार तय हुआ कि इस बार छठ नानी के गांव में होगा। भोजपुर जिले में पीरो से पूरब कोईल के पास कुसुम्ही गांव। गांव के दक्षिण में आहर। पेड़ों की लंबी कतार और उसके साथ नदीनुमा जल की धारा। बड़ा ही मनोरम दृश्य था उस आहर के किनार छठ का। वहीं भी गांव की सारी महिलाएं सारी रात जागकर उग ना सूरूज देव गाती रहतीं...वहां कभी कभी लोकनृत्य का भी आयोजन होता था। बड़ों के लिए पूजा थी। आस्था थी पर हमें तो इंतजार रहता था छठ के प्रसाद का। सुबह के अर्घ्य के बाद मां के हाथों से घाट पर प्रसाद पाने का इंतजार। अब मां की उम्र बढ़ती जा रही है वे अब छठ नहीं कर पातीं। पर उम्मीद है गांव में आज भी उसी तरह छठ होता होगा। और छठ पूजा का एक गीत...

कांच ही बांस के बहंगिया,
बहंगी लचकत जाय...
बहंगी लचकत जाय...
बात जे पुछेले बटोहिया
बहंगी केकरा के जाय ?
बहंगी केकरा के जाय ?
तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया,
बहंगी छठी माई के जाय...

( विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com) 

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