Wednesday, November 12, 2014

हर साल राजधानी बदलने का ड्रामा

( जन्नत में जल प्रलय - 60 )
हम जानते हैं कि जम्मू एंड कश्मीर की राजधानी श्रीनगर है। पर यह आधा सच है। वास्तव में श्रीनगर जम्मू एवं कश्मीर की गर्मियों की राजधानी है। हर साल अप्रैल महीने में राजधानी को जम्मू से श्रीनगर शिफ्ट किया जाता है। अक्तूबर में राजधानी एक बार फिर जम्मू वापस चली जाती है। राज्य सरकार के सचिवालय का 3000 लोगों को स्टाफ मूल रूप से सालों भर जम्मू में ही रहता है। जब राजधानी शिफ्ट की जाती है तब सारा स्टाफ श्रीनगर आ जाता है। ये सारे लोग सरकारी खर्चे पर श्रीनगर के निजी होटलों में छह महीने तक रहते हैं। इस दौरान उनका परिवार जम्मू में ही रहता है। यह सरकार पर एक तरह का अतिरिक्त बोझ है। इतना ही नहीं राजधानी शिफ्टिंग के दौरान साल में दो बार स्टाफ को 10-10 दिनों का अवकाश भी मिलता है। 

शिफ्टिंग के दौरान एडवांस पार्टी सारी फाइलें जम्मू से ट्रकों में लेकर श्रीनगर आती है। इन फाइलों को श्रीनगर सचिवालय में सजाया जाता है। फिर ऐसा ही काम राजधानी के श्रीनगर से जम्मू वापसी के समय भी होता है। राजधानी शिफ्टिंग के दौरान तकरीबन एक महीने सरकारी कामकाज विकास के फैसले पूरी तरह से ठप्प रहते हैं। भला ऐसी राजधानी शिफ्टिंग का क्या लाभ। इससे तो अच्छा है सालों पर राजधानी जम्मू में ही रखा जाए। इससे सरकारी खजाने का बड़ा खर्च बचेगा। आजकल गर्मियों में दफ्तरों में एसी चलाकर काम लिया जा सकता है।

सैलाब के समय राजधानी श्रीनगर में थी। सरकार के पास अच्छा बहाना था कि हम पूरी तरह लाचार हो गए। हमारे मंत्री और स्टाफ भी आपदा में फंसे हैं। अगर जम्मू से समांतर इंतजाम होते तो ऐसा बुरा हाल नहीं होता। 7 सितंबर को झेलम ने कहर ढाया था। 6 अक्तूबर को देश के अखबारों में एक तस्वीर छपती है। श्रीनगर सचिवालय के फाइलों को धूप में सुखाया जा रहा है। कंप्यूटर और आनलाइन कार्यपद्धति के जमाने में सरकार कितनी हाईटेक इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है।

स्टेट बैंक से सीखें - 2005 में मुंबई में जब भीषण बाढ़ का कहर बरपा उस समय स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने बहुत तेजी से आपदा प्रबंधन किया। बैंक ने रातो रात अपना सेंट्रल सर्वर मुंबई से हैदराबाद को शिफ्ट कर दिया। इससे स्टेट बैंक का देशव्यापी नेटवर्क ठप्प नहीं हुआ। बैंक ने इसके लिए पहले से वैकल्पिक इंतजाम कर रखे थे। जब कश्मीर घाटी में बाढ़ का पुराना इतिहास रहा तब जम्मू कश्मीर सरकार ने आपदा की घड़ी के लिए क्या कुछ सोचा नहीं था।

एक हजार करोड़ के सेब बरबाद 
कश्मीर में आई पिछले कई दशकों की भयानक बाढ़ से राज्य का बागवानी कारोबार बुरी तबाह हो गया। बाढ़ से राज्य में 1,000 करोड़ रुपये की सेब की फसल को नुकसान पहुंचा है। उद्योग मंडल एसोचैम के आंकलन अनुसार बाढ़ से कश्मीर में 1,000 करोड़ रुपये मूल्य के सेब की फसल बह गई जिससे किसानों पर जबरदस्त प्रभाव पड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार देशभर में ग्राहकों को भी इसका खामियाजा भुगतान पड़ सकता है। सेब की फसल खराब होने से उपभोक्ताओं को आने वाले त्यौहारी सीजन और सर्दियों में सेब के लिए उंची कीमत चुकानी पड़ सकती है। बाढ़ से सबसे अधिक प्रभावित जिले बारामुला, कुपवाड़ा और सोपोर सेब के सबसे बड़े उत्पादक जिले हैं, जहां भारी नुकसान हुआ है। पांपोर में जाफरान के बाग भी बरबाद हो गए हैं। पांपोर का जाफरान ( केशर) कश्मीर में सबसे बेहतरीन क्वालिटी का माना जाता है। जम्मू कश्मीर सरकार का आकलन है कि राज्य में 1568 करोड़ का बागवानी कारोबार तबाह हो गया है।

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