Thursday, October 23, 2014

मुश्किल में गुजरी राजभवन में पहली रात

( जन्नत में जल प्रलय – 38)
9 सितंबर 2014 - राजभवन में एक बीएसएफ के जवान से बात हुई। उन्होंने बताया कि 8 सितंबर से यहां फंसे लोगों की लिफ्टिंग हो रही है। इन्हें सेना के हेलीकाप्टर लिफ्ट करके श्रीनगर वायुसेना के एयरपोर्ट पर छोड़ रहे हैं। वहां से आगे जाने के लिए वायुसेना के विमानों का इंतजाम है। पर 8 को 500 तो 9 को 700 लोगों की लिफ्टिंग हो पाई है। राजभवन के अंदर ही दो हजार से ज्यादा लोगों की भीड़ जमा है। बड़ी संख्या में लोग सडक पर भी खडे हैं जो लिफ्टिंग के लिए अंदर आने का इंतजार कर रहे हैं।

भीड़ को देखकर निराशा हुई कि अगले दिन हमारी यहां से लिफ्टिंग हो पाएगी या नहीं। मैंने ये जानकारी पाने की कोशश की आखिर लिफ्टिंग की मैकेनिज्म क्या है। बीएसएफ यहां पर ग्राउंड मैनजमेंट देख रही है। जबकि वायुसेना के हेलीकाप्टर लिफ्टिंग में लगे हैं। बीएसएफ के एक अस्सिटेंट कमांडेंट स्तर के अधिकारी भीड़ के बीच खड़े थे। वे लोगों के सवालों का जवाब दे रहे थे- हमारी प्राथमिकता में महिलाएं, बच्चे और विदेशी नागरिक हैं। हम कल पहले उन्हें लिफ्ट कराएंगे। मैंने पूछा – ऐसे में तो महिलाओं के चले जाने से उनका परिवार अलग हो जाएगा। श्रीनगर एयरपोर्ट से आगे घर का सफर महिलाएं आगे कैसे तय करेंगी। मेरी ही तरह की आशंका तमाम लोगों की थी जो अपने परिवार के साथ थे। उस अधिकारी ने मेरे सवाल पर बड़े ही बदतमीजी से जवाब दिया – क्या तुम अपनी बीवी के साथ हमेशा चिपके रहते हो..वह कभी अकेले बाजार नहीं जाती...क्या शादी से पहले वह अकेली नहीं थी...क्या वह पहले किसी और के साथ नहीं घूमती होगी... इसके आगे और भी गंदी बातें जिसे यहां लिखा नहीं जा सकता... इस अधिकारी से तर्क करना फिजूल था। अंधेरा छाने लगा। पूरे श्रीनगर शहर में बिजली नहीं थी। तो राजभवन में भी बिजली नहीं थी। चारों तरफ अंधेरा छाया था।

भूखे रहने को हुए मजबूर -  रात गहराने लगी तो पेट में चुहे दौड़ने लगे। दिन में भी ठीक से निवाला नहीं मिला था। हजारों इंतजार कर रहे लोगों के लिए यहां कुछ भी खाने का इंतजाम नहीं था। कुछ केले के पैकेट आए। कुछ सौ लोगों को एक एक केला मिल सका। पर हमारी बारी नहीं आई। हमारे बैग में बिस्कुट के कुछ पैकेट थे। हमने दो चार बिस्कुट बांट बांट कर खा लिया। एक दिन पहले कच्चे चावल खाने से इनकार करने वाली माधवी से वानी साहब मजाक कर रहे हैं। जरा माधवी से पूछो तो आज हमारे नसीब में तो कच्चे चावल भी नहीं है।

हेलीपैड के बगल में स्थित हैंगर जहां राज्यपाल के हेलीकाप्टर रात को आराम फरमाता है वह आज बड़े एयरपोर्ट पर चला गया है। इसलिए इसके अंदर कुछ सौ लोगों ने अपने सोने के लिए जगह बना ली। बाकी लोग खुले आसमान के नीचे। गुलाम रसूल वानी साहब भी खुले आसमान के नीचे चादर बिछाकर सो गए। दिल्ली में दिसंबर में जितनी ठंड पड़ती है, रात को यहां उतनी ही ठंड थी। गुलाम भी ने हमारा स्वेटर पहना और सोने की कोशिश करने लगे। पर मैं, आफताब भाई और रामपुर वाले मसूद भाई सारी रात इधर उधर घूमते रहे। नए नए लोगों से बातें करते रहे। उनका दर्द उनकी आपबीती जानने की कोशिश में लगे रहे। रात गुजारने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता था। कई जगह जंगल की लकड़ियां लाकर अलाव जला चुके थे।
-    vidyutp@gmail.com  ( RAJ BHWAN, SRINAGAR, FLOOD ) 


   

No comments:

Post a Comment