Friday, October 10, 2014

कुपवाड़ा की बहनों का दर्द

( जन्नत में जल प्रलय 25)
श्रीनगर में लगने वाले सरस मेले में हिस्सा लेने के लिए सुदूर नागालैंड और त्रिपुरा से कलाकार तो आए ही हैं, पर यहां जम्मू कश्मीर के कई जिलों के भी कलाकार आए हैं। श्रीनगर के सबसे नजदीक का जिला है कुपवाड़ा। राजधानी से दूरी है महज 100 किलोमीटर। यहां से आई हैं चार बहनें। बिल्कुल परंपरागत कश्मीरी अंदाज में रहने वाली इन महिलाओं का हस्तशिल्प का कारोबार है। ये लोग कश्मीरी गर्म सूट बनाती हैं। पूरे देश भर से आकर लोग श्रीनगर में सैलाब में फंस गए हैं। पर कोई अपने घर से महज 100 किलोमीटर दूर फंसा हुआ है। रास्ता है महज दो घंटे का लेकिन जा नहीं सकते। क्योंकि श्रीनगर से कुपवाड़ा जाने के रास्ते में भी पानी जमा है। कोई वाहन नहीं जा रहा है। श्रीनगर के आसपास के शहर शोपियां, गुलमर्ग, सोनमर्ग, पहलगाम के रास्ते भी बंद हैं।


दूर राज्यों से आए लोगों की तुलना में कुपवाड़ा की बहनों की व्याकुलता ज्यादा है। वे होटल के प्रबंधन से जुड़े स्टाफ और अडोस पड़ोस के लोगों से कश्मीरी में भी बातें करती हैं। पर इन बातों से कोई समाधान नहीं निकलता है। सुबह से शाम तक ये लोग हर घंटे यहां से निकलने के लिए किसी रास्ते के बारे में पता करना चाहती हैं। पर उन्हे कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिलता है। कई बार ये उदास होकर रोना शुरू कर देती हैं। उन्हे रोता देख दूसरे लोग भी दुखी हो जाते हैं। कुछ समझदार लोग ढाढस बंधाने की कोशिश करते हैं पर सब बेकार।

कुपवाडा की ये बहनें बताती हैं कि उनके श्रीनगर शहर में कई रिश्तेदार हैं। पर वे जिन मुहल्लों में रहते हैं वे सारे डूब चुके हैं। वहां पानी डल गेट इलाके से भी ज्यादा आया है। इसलिए चाह कर भी उनके पास नहीं जा सकते। शायद वे रिश्तेदार भी अपना घर छोड़कर किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचे होंगे। फोन चल ही नहीं रहे हैं इसलिए किसी भी रिश्तेदार को फोन नहीं कर सकते। कुपवाड़ा की इन बहनों को चिंता इस बात की भी है कि उनके अपने घर गांव में भी न जाने कितनी बरबादी हुई होगी। क्योंकि सुनने में आ रहा है कि पानी ने पूरे कश्मीर में कहर ढाया है। ऐसे वक्त में अपने रिश्तेदारों का भी कुशल क्षेम नहीं मिल पा रहा है। अपनी उम्र में इन लोगों ने कश्मीर में ऐसी त्रासदी, इतना पानी कभी नहीं देखा था।


जब होटल रिट्ज छोड़ने की बारी आई तो कुपवाड़ा की इन बहनों को हेलीकॉप्टर लिफ्टिंग से बाहर जाने की जरूरत नहीं थी। उन्हें तो 100 किलोमीटर दूर अपने शहर पहुंचना था। तब वानी साहब और मसूद भाई ने उन्हें श्रीनगर शहर में ही उनके किसी रिश्तेदार के घर पहुंचा दिया। जहां पर वे अगले कुछ दिनों के लिए महफूज थीं। अब उन्हें इंतजार था रास्ता खुलने का। जब वे सड़क मार्ग से अपने शहर को पहुंच सकें। पर पानी ने इतना कहर ढाया था कि श्रीनगर से आसपास के शहरों का भी रास्ता खुलने में कई दिन लग गए।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

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