Tuesday, November 4, 2014

और आ गया मेरा भी नंबर...

( जन्नत में जल प्रलय - 51)
राजभवन के हेलीपैड पर मेरा चौथा दिन था। शाम होने को आ गई थी। अब हेलीकाप्टर लिफ्टिंग बंद होने में थोड़ा समय ही बच गया था। मेरा समूह नंबर 90 था जबकि मेरे समूह से आगे 95 तक की लिफ्टिंग हो गई थी। दो दिन बीएसएफ के जवानों के साथ स्वयंसेवा करने का भी मुझे कोई लाभ नहीं मिला था। आज दिन भर भले ही टोकन सिस्टम से लिफ्टिंग हो रही थी। 

पर बाद में एक समूह के लोगों को दूसरे समूह के साथ जिस तरह से मिला जुला दिया गया था एक बार फिर नियम और अनुशासन की धज्जियां उड रही थीं। पर मत्स्य न्याय के इस दौर में हम कुछ भी कर नहीं सकते थे। एक समूह के लोगों को दूसरे समूह में मिला देने से किसी के दो साथी चले गए थे तो दो साथी यहीं पर रह गए थे। जब इसकी शिकायत लोगों ने खड़े होकर की तो जीएस भिंडर ने एक बेहूदी सी कहानी सुनाई। ये कहानी मेढक और केकड़े की थी। उसने कहा तुम सारे लोग केकड़े की तरह हो जो हमेशा साथ जाना चाहते हैं।मेढकों की तरह क्यों नहीं हो जो अकेले अकेले कूदते रहते हैं। उन्हें कौन समझाए कि आपदा की घड़ी में दो दोस्त या दो परिवार के लोग हमेशा साथ ही रहना चाहते हैं।


शाम ढलती जा रही थी, मुझे लग रहा था शायद आज की रात भी मुझे फिर इसी हेलीपैड पर गुजारनी पड़ेगी। भूख से बेहाल ये पांचवां दिन था। श्रीनगर के खूबसूरत राजभवन में सेब के बाग थे। भूखे लोग सारे कच्चे पक्के सेब तोड़कर खा चुके थे। अब यहां खाने को कुछ भी नहीं बचा था।

लाइन में लगे लगे हमें सात घंटे से ज्यादा हो गए थे। अचानक एक ईशारा हुआ हमारी लाइन को खड़े होने के लिए कहा गया। मुझे एक बार तो भरोसा नहीं हुआ कि मेरा नंबर आ गया है। पर हम अभी भी लैंड हुए हेलीकाप्टर नंबर जेड पी 5200 की ओर दौड़ चले। जो हेलीकाप्टर लिफ्टिंग के लिए आ रहे थे उनके नंबर जेडपी 5202, 5197 जैसे सीरीज में थे। ये सभी 28 सीट वाले हेलीकाप्टर हैं। वायुसेना में 4 दशक से अपनी सेवा दे रहे एमआई 17 सीरीज के ये हेलीकाप्टर पीछे से खुले हुए होते हैं। आपदा की घड़ी में इनसे आसमान से ही राहत सामग्री फेंकी जा सकती है। बहु उपयोगी ये हेलीकाप्टर सामान ढोने, आपदा में फंसे लोगों को ढोने या युद्ध में खाद्य सामग्री या किसी भी तरह के काम में लगा दिए जाते हैं। इन हेलीकाप्टर में बायीं और दाहिनी तरफ बैठनेके लिए बेंच बनी है। मुझे बेंच पर जगह नहीं मिली तो नीचे फर्स पर ही बैठ गया। वायु सेना के एक को पायलट अपने लाग बुक में सभी लोगों का नाम लिख रहे थे।

जैसे ही विमान हेलीपैड से उड़ा, लगा जैसे बहुत बड़ी राहत मिली हो और हम आपदा से बाहर निकल रहे हैं। हेलीकाप्टर से नीचे पूरा श्रीनगर शहर दिखाई दे रहा है। चारों तरफ पानी ही पानी है। डूबे हुए घर माचिस के डिब्बे की तरह नजर आ रहे हैं। कोई दस मिनट के सफर में श्रीनगर का वायुसेना विशाल एयरपोर्ट और उसका रनवे नजर आने लगा। श्रीनगर एयरपोर्ट ऊंचाई पर बना है। इसलिए यहां पानी नहीं था। शाम के पांच से ज्यादा बजे हैं और हमारा हेलीकाप्टर श्रीनगर के वायुसेना के एयरपोर्ट के रनवे पर धीरे धीरे नीचे उतर रहा था। उतरने के साथ हमने अपने पायलट को हाथ मिलाकर धन्यवाद दिया। मैं संकट से बाहर निकल चुका था।
-    vidyutp@gmail.com  


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