Sunday, November 2, 2014

श्रीनगर को संवारते हैं ये बिहारी मजदूर

श्रीनगर के राजभवन में अपनी बारी का इंतजार करते मजदूर।  ( फोटो- विद्युत )
( जन्नत में जल प्रलय - 48 )
श्रीनगर में आई आपदा में बड़ी संख्या में बिहार, बंगाल, झारखंड और यूपी के पूर्वांचल क्षेत्र के मजदूर भी फंसे थे। इनमें से बडी संख्या में मजदूर वर्ग के लोग हमारे साथ हेलीपैड पर भी मौजूद थे जो आपदा से निकलने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। मेरे आसपास बेतिया से आए सैकड़ों मजदूर थे। हालांकि इन्हें दशहरे में घर वापस जाना था, अभी दशहरा आने में एक महीना है लेकिन आपदा में ये लोग भी फंस गए और अब वापस अपने गांव जाना चाहते हैं।

श्रीनगर में काम करने वाले मजदूर हर साल होली के बाद श्रीनगर मजदूरी की तलाश में आते हैं। कई महीने काम के बाद इनकी वापसी दशहरे के आसपास अपने गांव के लिए होती है। साल के आठ महीने श्रीनगर में काम करने वाले ये बिहार के मजदूर राज मिस्त्री, राज मिस्त्री के सहायक, मार्बल प्लेट लगाने का काम, पेंटिंग का काम और भवन निर्माण से जुड़े दूसरे तमाम तरह के काम करते हैं। एक अनस्किल्ड लेबर को यहां 400 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी मिलती है। वहीं स्किल्ड लेबर को और भी ज्यादा। इन मजदूरों के बीच ही एक ठेकेदार होता है जो इन्हें काम दिलवाता है। हर दिन की दैनिक मजदरी में ठेकेदार का कमीशन भी होता है। श्रीनगर शहर में हर साल 30 से 40 हजार मजदूर आते हैं जो अपनी मेहनत से इस जन्नत को और भी खूबसूरत बनाते हैं। यानी श्रीनगर शहर के हर होटल की इमारत और दूसरी सभी प्रमुख इमारतों को ये बिहारी हाथ ही जोड़ते हैं। श्रीनगर शहर के कुछ प्रमुख चौक चौराहे हैं जहां पर रोज सुबह बड़ी संख्या में श्रमिक मौजूद होते हैं लोग उन्हें अपने घर काम कराने के लिए ले जाते हैं। अपने श्रीनगर प्रवास के दौरान ये लोग छोटे छोटे कमरे किराये पर लेकर रहते हैं। इन कमरों में 400  से 600 रुपया प्रति व्यक्ति किराया देना पड़ता है। इस सूरत में भी अपने घर वालों के लिए काफी रुपया कमाकर गांव ले जाते हैं। पर श्रीनगर को संवारने वाले इन श्रमिक के साथ महंगे कपडे पहनने वाले सैलानी दोयम दर्जे के नागरिकों सा सलूक कर रहे हैं।
कई मंहगे लिबास में आए सैलानियों को लोगों को लग रहा है कि इन मजदूरों के कारण ही हमारी लिफ्टिंग में नंबर नहीं आ पा रहा है। अभी क्या अमीर क्या गरीब सभी पीड़ित हैं। इस आपदा से बाहर निकलने का सबका बराबर का हक है।

सारी कमाई लूट गई - बेतिया के एक मजदूर देवीदयाल कुशवाहा कहते हैं कि झेलम के किनारे कमरे में रहते थे। सात की सुबह पानी आया तो सब कुछ छोड़कर भागना पड़ा। जिस ठेकेदार के यहां काम किया था उससे कई महीने का पैसा भी नहीं मिला। चार दिन से हेलीपैड पर लिफ्टिंग का इंतजार कर रहा हूं। इस बीच आज सुबह हमारे दो साथी श्रीनगर में कमरे तक जाकर अपना सामान लाने की कोशिश करने गए थे। पर उधर अभी 20 फीट तक पानी है। वे रोते हुए कहने लगे- इस बार हमारी गाढ़ी कमाई मारी गई। श्रीनगर शहर पर ऐसा कुदरत का कहर हमने पहले कभी नहीं देखा था।

अब फिर नहीं आना श्रीनगर - मैं पूछा अगले साल फिर आआगे यहां काम की तलाश में। देवीदयाल ने दोनों कान पकड़े कहा, पंजाब चला जाउंगा, गुजरात चला जाउंगा, थोड़े कम पैसे में गुजारा कर लूंगा पर जैसा कहर देखा है कि अब आगे से कभी श्रीनगर नहीं आउंगा।

कुछ दिनों बाद ही श्रीनगर शहर में जब बाढ़ का उतरने लगा तो दरकती दीवारों की मरम्मत के लिए मजदूरों की जरूरत पड़ने लगी। पर अब श्रीनगर के उन चौक चौराहों पर जहां कभी काम के लिए मजदूर मिल जाते थे, वे चौराहे अब वीरान पड़े हैं। शहर के लोगों की चिंता है अब कौन करेगा हमारे टूटे फूटे मकानों की मरम्मत।

-    vidyutp@gmail.com  


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