Wednesday, October 29, 2014

हमारी हालत भिखारियों जैसी हो गई...

( जन्नत में जल प्रलय - 44 )
10 सितंबर 2014 – शाम हो गई और हेलीकाप्टर लिफ्टिंग बंद हो गई थी। वायुसेना के इन हेलीकाप्टरों में नाइट विजन नहीं है इसलिए ये रात होने पर या दिन में भी ज्यादा मौसम खराब होने पर उडान नहीं भर सकते।

माधवी और अनादि हेलीपैड से जा चुके थे। अब मैं अकेला रह गया था। वानी परिवार भी निकल चुका था। रामपुर वाले मसूद भाई का अभी नंबर नहीं आया था। दिन भर से कुछ खाने को नहीं मिला था। हेलीपैड पर मौजूद हजारों लोग भूखे थे। जो हेलीकाप्टर लोगों को एयरपोर्ट तक लिफ्ट करके ले जा रहे थे, उन्ही हेलीकाप्टर से वापसी के समय कुछ रीलिफ मैटेरियल यानी खाद्य सामग्री आती थी। ये आने वाली खाद्य सामग्री वहां मौजूद लोगों के लिए नाकाफी थी। कभी छोटे छोटे नमकीन के पैकेट ( पांच रुपये साइज वाले), कभी बिस्कुट के छोटे पैकेट और केले आ रहे थे। पर ये हेलीपैड पर मौजूद सभी लोगों को नहीं मिल पाते थे।

इसी दौरान हमें पता चला कि करीब 200 रोटियों के पैकेट आए हैं। बीएसएफ के अस्सिटेंट कमांडेंट साहब खुद रोटियों के पैकेट बांटने लगे। हेलीपैड पर बड़ी संख्या में मजदूर मौजूद थे जिन्हें कई दिनों से एक भी अन्न का दाना नहीं मिला था। इसलिए उन्होंने रोटियों के इन पैकेट के लिए भीड़ लगा दी। इस भूख से बेहाल भीड़ देखकर इस अफसर को पता नहीं कैसी अनुभूति हुई। 

उसने पूछा – बताओ रोटियों के पीछे आखिर कौन भागता है... भीड से कुछ लोगों ने जवाब दिया... कुत्ते... इस पर अफसर महोदय बहुत खुश हुए.. उन्होंने कहा...हां तुम सब कुत्ते जैसे ही तो हो...यह कहते हुए उन्होंने रोटियों के पैकेट को हवा में उछाल दिया...और कई दिन से भूख से बिलबिलताते पेट वाले  लोग इन रोटियों को लूटने में जुट गए।

मैं असहाय भूखे लोगों का ये अपमान देखता रहा। इतने के बाद इस अफसर महोदय ने रामलीला के रावण की तरह बड़ा अट्टहास लगाया। किस्मत के मारे लोग जो श्रीनगर के इस आपदा में फंस गए। क्या अमीर क्या गरीब सभी भूखे थे। सरकार रिलीफ मैटेरियल भिजवा रही थी। पर गरीबों की गरीबी का ऐसा अपमान...

इतना ही नहीं ये बीएसएफ के अफसर महोदय के पास जब भी कोई अपनी मजबूरी लाचारी लेकर याचक बनकर पहुंच जाता था, ये सबसे पहले गंदी गंदी गालियों से उसका स्वागत करते थे। पढ़े लिखे लोग तो इनसे बात करने में शर्म महसूस करने लगते थे। एक बार तो इन्होंने याचना कर रही महिलाओं के समूह को भी अपनी गंदी जुबान से गालियां देनी आरंभ कर दी। पर वह महिला बहादुर थी। उसने भी प्रत्तुत्तर में इन्हें जमकर खरी खोटी सुनाई। उस महिला की खरी खोटी वे अपमानित होकर सुनते रहे। पर जाते जाते अपने जूनियर को बोलकर गए कि अगर ये महिला चुप नहीं होती है तो इसे गेट से बाहर कर देना।

बीएसएफ के तमाम जवान और अधिकार बड़े दिल से आपदा पीड़ितों की सेवा में जुटे थे, पर एकमात्र अधिकारी के कारण आपदा प्रबंधन का सिस्टम चरमराया हुआ था। वह ऐसे काम कर रहा था जैसे उसके शब्द ही कानून हों। न कोई अनुशासन न नियम बद्धता न ही कोई पंक्ति लगाने का सिस्टम। पांच दिन से इंतजार कर रहे लोगों का नंबर नहीं आता था। तो कई बार दो घंटे पहले आए लोगों का नंबर आ जाता था। ऐसे में लोगों की निराशा बढ़ती जा रही थी। मन में गुस्सा था पर करें क्या। इन गड़बड़ियों को लेकर अगर कोई गुहार लगाने जाता था तो ये अफसर कहते थे, नेता बनते हो. इसको किनारे करो जी, इसको चार दिन बाद यहां से भेजा जाएगा।

एक निराश युवक ने अपना हेलीकाप्टर लिफ्टिंग के लिए नंबर नहीं आने पर कहा, लगता है यहां से हमारी डेड बॉडी ही जा पाएगी। इस पर अफसर बोले- अगर दो दिन और बारिश होती रहती तो तेरी ये इच्छा भी पूरी हो जानी थी। एक बार वे अपने मुखारविंद से गालियां निकाल रहे थे। मैं अपने कैमरे से तस्वीर ले रहा था...वे बोल पड़े- ए लड़के रिकार्डिंग बंद कर नहीं तो तेरा कैमरा तोड़ दूंगा।
-    vidyutp@gmail.com  


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