Monday, October 27, 2014

इंतजार...आखिर कब आएगा हमारा नंबर

( जन्नत में जल प्रलय - 42 )
नौ सितंबर की रात को 12 बजे हमने देखा कि सैकड़ो लोगों ने जिसमें बड़ी संख्या में बिहार यूपी के मजदूर वर्ग के लोग थे उन्होंने लाइन लगा दिया। सर्द रात में वे लोग लाइन लगाकर  बैठे गए थे इस उम्मीद के साथ कि शायद कल उनका नंबर आ जाए हेलीकाप्टर लिफ्टिंग के लिए। पर मुझे हकीकत का अंदाज हो गया था। बीएसएफ के उस अस्सिटेंट कमांडेंट ने कह दिया था कि हम महिलाओं को प्राथमिकताके तौर पर भेजेंगे। शिविर में महिलाओं बच्चों की संख्या ही एक हजार के करीब थी, लिहाजा हमारा नंबर नहीं आने वाला था।

हमने माधवी और अनादि को रात में मिलकर समझाने की कोशिश की। अगर महिलाओं और बच्चों की पहले लिफ्टिंग हो रही है तो आप लोग पहले चले जाओ। माधवी इसके लिए तैयार नहीं थी। 

वंश भी बोला पापा आपको तो छोड़कर हरगिज नहीं जाउंगा। मैंने माधवी को समझाया. यहां खाना नहीं मिल रहा है खुले आसमान के नीचे सर्द रात गुजारनी है। आपको अगर मौका मिल रहा है तो आप पहले चली जाओ। श्रीनगर एयरपोर्ट से सुना है कि दिल्ली तक भेजने का इंतजाम है। आप पहले चली जाओगी तो दोस्तों रिश्तेदारों को हमारा कुशल क्षेम मिल जाएगा। फिर वहां से आप मेरी सही लोकेशन बता कर हमारी लिफ्टिंग के लिए भी कुछ प्रयास कर सकोगी। यहां भूखे प्यासे, खुले आसमान में रहकर वंश और आपकी तबीयत बिगड़ सकती है। मैं बचपन में गांव में रहा हूं तो थोड़ा और वक्त इस मुश्किल घड़ी में भी गुजार सकता हूं।

काफी समझाने पर माधवी और अनादि अकेले भी जाने को तैयार हो गए। हम सबके पास अलग अलग बैग पहले से ही था। 10 सितंबर की सुबह  वे लोग अपनी लिफ्टिंग के लिए लाइन में लग गए और अपनी बारी का इंतजार करने लगे। वानी साहब के परिवार के महिलाएं और बच्चे और सरस मेले कुछ शिल्पी परिवार के परिचित लोग भी इन लाइन में थे। पर लाइन में लगने को लेकर कोई नियम कानून नहीं था। तीन घंटेका वक्त को जम्मू कश्मीर सरकार के सचिवालय के कर्मचारियों ने बर्बाद कर डाला था। जब दोपहर में वायुसेना के हेलीकाप्टर आने लगे तब बीएसएफ के अधिकारी लाइन में लगे लोगों को हेलीकाप्टर की ओर बुलाते थे। एक हेलीकाप्टर में जगह तो थी 26 लोगों के लिए। लेकिन वे हेलीकाप्टर की ओर 40 लोगों को दौड़ा देते थे। लिहाजा हेलीकाप्टर में चढ़ने के लिए धक्का मुक्की हो जाती थी। 

कुछ लोगों को लेकर हेलीकाप्टर उड़ जाता था। बाकी लोग निराश होकर वापस लौट आते थे। जो लोग लौट आते थे उन्हें अगले चौपर में सबसे आगे जगह मिलनी चाहिए थी पर ऐसा नहीं होता था। ये पुलिस वाले डंडा बरसा कर इन महिलाओं और बच्चों को पीछे धकेल देते थे। यानी महिलाओं बच्चों के साथ भी गुंडागर्दी का खेल जारी था। परेशान महिलाएं और बच्चे अपनी व्यथा के साथ पुलिस और बीएसएफ के लोगों के साथ बकझक कर रहे थे। पर ग्राउंड मैनजमेंट देख रहे लोग मौज मजे से इंतजामात देख रहे थे। कुल मिलाकर मत्स्य न्याय के हालात थे। महिलाओं और बच्चों में भी निराशा थी। उनका नंबर कब आएगा, वे इसको लेकर निश्चिंत नहीं थे।
vidyutp@gmail.com  


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