Tuesday, October 7, 2014

लूट गई देश भर से आए शिल्पियों की सारी जमा पूंजी

( जन्नत में जल प्रलय 22) 

-    एक होटल में कई दिनों तक फंसे रहे 22 राज्यों के 250 शिल्पी

-    बटमालू नुमाइश ग्राउंड में करोड़ों का माल बाढ़ में बह गया

हिन्दुस्तान के 22 राज्यों के 250 शिल्पी श्रीनगर पहुंचे थे अपने हाथों के हुनर से बनाई सामग्रियां लेकर। इस खूबसूरत शहर में 10 दिनों तक चलने वाले सरस मेले में होने वाली बिक्री से लाखों कमाई की उम्मीद थी। पर कश्मीर के कई हिस्सों में लगातार हो रही बारिश के कारण 4 सितंबर से शुरू होने वाले मेले की तारीख बढाकर 10 सितंबर कर दी गई। कौनाखान रोड के होटल रिट्ज में ठहरे 250 कलाकारों को उम्मीद थी कि एक हफ्ते बाद ही सही मेला शुरू होगा तो कुछ बिक्री होगी और अच्छी कमाई के साथ अपने घर को लौटेंगे।

पर बटमालू स्थित नुमाइश ग्राउंड में लगने वाला मेला अब हमेशा के लिए रद्द हो चुका था। देश भर से आए शिल्पियों का सारा समान पानी में डूब चुका था। बनारस की साड़ी, चंबा के चुक,  हिमाचल के अचार, मणिपुरी शाल और तमाम राज्यों का नायाब कलाकृतियां बाढ़ की भेंट चढ़ चुकी थीं। कमाई तो दूर अब तो सिर्फ जान बचाने की पड़ी थी।
हिसार के एक भाई जूतियों का स्टाक लेकर आए थे। वही जूतियां जो कभी पाकिस्तान कसूर शहर में बनती थीं। अब उस तरह की जूतियां पंजाब के अबोहर और हरियाणा के हिसार शहर में बनती हैं। उन्हें अपने स्टाक के भींग जाने कि चिंता सता रही थी। लाखों का माल बाढ़ की भेंट चढ़ चुका था। पंजाब के बरनाला के एक स्वंय सहायता समूह का कुछ लोग अलग अलग किस्म के अचार लेकर आए थे। पर वे अब लाचार थे। अचार का स्टाक नुमाइश ग्राउंड में पड़ा था। इधर जान सांसत में थी। आंध्र प्रदेश के काकीनाडा से आए नायडू और उनके साथी अपने यहां साड़ियां लेकर आए थे। अब उन्हें साड़ियों की नहीं अपनी जान की चिंता थी।

दिल्ली के विकासपुरी की रहने वाली ऋचा और उनके पिता नए अंदाज और डिजाइन के सूट लेकर आए थे। पाकिस्तानी स्टाइल के सूट की श्रीनगर में काफी मांग रहती है। उम्मीद थी काफी बिक्री होगी। पर लाखों माल मेला ग्राउंड में फंस गया। ये पता लगाना भी मुश्किल था कि माल सुरक्षित है भी या नहीं।
वाराणसी से पीली कोठी के आसपास के मुहल्लों में रहने वाले कई कारीगर बनारसी साड़ियों का अच्छा खासा स्टाक लेकर चले थे। बनारसी साड़ियां काफी महंगी होती हैं। पर अब सारी साड़ियां बाढ़ के बीच मेला ग्राउंड में फंस गई हैं। बनारसी भाई बताते हैं कि दो चार साड़ियां वे अपने साथ लेकर चलते हैं । बाकी का माल ट्रांसपोर्ट से मंगाते हैं। थोड़ा माल साथ इसलिए लेकर चलते हैं, क्योंकि कई बार मेला शुरू होने के पहले दिन ट्रांसपोर्ट का माल नहीं पहुंच पाता। तब वे अपने साथ बैग में रखी साड़ियों को डिस्प्ले कर देते हैं। वही साथ वाली साड़ियां ही बची हैं।

मणिपुर से मणिपुरी नागा समुदाय की कई लड़कियां नागा हैंडीक्राफ्ट लेकर आई हैं। उनका कुछ माल उनके साथ है। बाकी का माल मेला ग्राउंड में। सबके चेहरे पर अपने माल को लेकर एक जैसी चिंता की लकीरें हैं। सब मिलाकर करोड़ो का माल बनता है जो अब सुरक्षित मिल पाएगा या नहीं इसकी चिंता है। ज्यादादर हस्त शिल्पी छोटे कारोबारी हैं। उनके लिए ये जीवन का बड़ा घाटा है जिसकी भरपाई मुश्किल है।
vidyutp@gmail.com

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