Saturday, November 8, 2014

56 घंटे गुजारे कच्चे चावल खाकर

( जन्नत में जल प्रलय - 55)
प्रेम सागर – मैनेजर पंजाब नेशनल बैंक
पंजाब के रहने वाले प्रेम सागर श्रीनगर के पंजाब नेशनल बैंक की एक शाखा में मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं। वे अस्थायी तौर पर बंटवारा इलाके में पर्ल होटल में रहते थे। बताते हैं कि झेलम नदी उनके होटल के ठीक सामने से बहती है। बकौल प्रेम सागर 7 की सुबह तीन बजे झेलम नदी का बांध टूटा और पानी उनके होटल में घुसा। 6 फीट ऊंची पानी की लहर आई जो सब कुछ बहा ले जाना चाहती थी। महज दो घंटे में ही पानी ने होटल की दो मंजिलों को डूबो दिया। 

होटल में करीब 30 लोग मौजूद थे। सभी जान बचाने के लिए ऊपर की ओर भागे। सभी लोगों ने तीसरी मंजिल पर जाकर शरण ली। चारों तरफ पानी था। पानी अगले 12 घंटे तक होटल में घुसता रहा। आसपास में सभी भवन डूबे हुए थे। अपने होटल से निकलकर किसी भी सुरक्षित स्थल की ओर जाने का कोई रास्ता नहीं था। जल्दी कहीं से कोई राहत आने की उम्मीद  भी नजर नहीं आ रही थी। कुछ घंटे गुजरे तो सबको भूख लगने लगी। होटल में खाने का कोई इंतजाम नहीं था। अगर किसी के पास कुछ था भी तो नीचे का दो मंजिले डूब चुकी थीं। कहां से कुछ लाएं। होटल के उपर की मंजिल पर एक स्टाफ रहता था जो अपना खाना खुद बनाता था। उसके पास 10 किलो चावल का स्टाक था।
पर इस चावल को हम पका नहीं सकते थे। न तो चूल्हा था न कोई और तेल मसाले। हमारे पास कोई विकल्प मौजूद नहीं था। अब हम क्या करते। कच्चे चावल को पानी में फूलने के लिए कुछ घंटे छोड़ देते थे। जब ये चावल थोड़ा मुलायम हो जाता था तो हम उसे चबा चबा कर खा जाते थे। इन्ही कच्चे चावलों को चबा चबा कर हमने 72 घंटे गुजार दिए। इसके बाद कहीं जाकर हमें एक नाव लेने आई। इन नावों से हम गहरे पानी से निकलकर सुरक्षित स्थान को पहुंचे। वहां से पैदल चलकर राजभवन।



प्रशांत, शिक्षक, केंद्रीय विद्यालय, बंटवारा  
दिल्ली के मौजपुर इलाके के रहने वाले प्रशांत केंद्रीय विद्यालय बंटवारा में गणित के शिक्षक हैं। दो साल पहले उनका श्रीनगर में तबादला हुआ। तब ये शहर उन्हे बड़ा खूबसूरत लगा था। पर सितंबर के पहले महीने पर झेलम दरिया खतरे के निशान से उपर बहने लगी तब नदी की धारा देखकर उन्हें खतरे का अंदेशा होने लगा था क्योंकि उनका स्कूल बिल्कुल झेलम नदी के किनारे बना हुआ है। चार सितंबर को आखिरी दिन जब स्कूल में बच्चे आए तो उन्हें लगा कि कभी भी स्कूल में पानी आ सकता है। प्रशासन ने उसी दिन से छुट्टी का ऐलान कर दिया था। हालांकि 6 सितंबर शनिवार का स्कूल के शिक्षक हाजिरी लगाने स्कूल में गए। अगले दिन स्कूल के ज्यादातर शिक्षक बाढ़ में फंस गए। उनका स्कूल पूरी तरह डूब चुका था। सभी शिक्षक जो स्कूल के आसपास के इलाके में ही रहते थे अपने अपने घरों में फंस गए थे। क्योंकि झेलम का पानी उनके घर की दो मंजिलें तक डुबो चुका था। 

प्रशांत ने जो तबाही का मंजर देखा उसका खौफ उनकी आंखों में कई दिनों बाद भी देखा जा सकता था। प्रशांत से मेरी मुलाकात हेलीपैड पर 11 सितंबर को हुई। 12 सितंबर को उनकी एयर लिफ्टिंग हमारे आसपास ही हुई। वे दो साल से श्रीनगर में हैं और थोड़ी थोड़ी कश्मीरी भाषा भी समझ लेते हैं। पर इस आपदा के बाद उनका मन श्रीनगर शहर से भर आया है। वे मानते हैं कि विकास की अंधी दौड़ और बेतरतीब निर्माण ने पहाड़ों के इस शहर को बदरंग कर डाला है। जो तबाही मची है इस शहर में उसके बाद फिर से सब कुछ पटरी पर आने में लंबा वक्त लग जाएगा। कुछ दिनों बाद उनका स्कूल खुल जाएगा पर स्कूल आने वाले बच्चों के चेहरे भी खौफजदा होंगे। वे जब जब अपने पड़ोस से बह रही झेलम को देखेंगे तब तब तबाही की यादें जेहन में होंगी।


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