Friday, September 12, 2014

सदभावना के साथी - जो याद आएंगे हमेशा ((59))


(पहियों पर जिंदगी - 58 )
वैसे तो सदभावना रेल यात्रा में शामिल रहे हर यात्री का यात्रा को सफल बनाने में योगदान माना जाएगा,  पर मैं कुछ लोगों को याद करने की कोशिश कर रहा हूं जिनके साथ हमारा अच्छा वक्त गुजरा।

रामाकृष्णा  रामकृष्णा कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में मल्लेश्वरम इलाके के रहने वाले हैं। वे पहले भी एनवाईपी के कई शिविरों में आ चुके हैं। बातें करने में थोड़े तुनक मिजाज हैं पर काम करने में काफी गंभीर। उन्हें एकाउंट्स की गहरी समझ है, इसलिए एनवाईपी का सारा एकाउंट्स वे देखते हैं। रुपये पैसे के हिसाब किताब रखने में वे पारंगत हैं। अक्सर वे यात्रा के दौरान रेलगाड़ी से बाहर नहीं जाते। दिन भर रेल के साथ ही रहते हैं। दफ्तर कोच कावेरी में सुब्बराव जी के बगल वाले कुप्पे में विराजमान रहते हैं।

भवानी भाई  भवानी भाई कर्नाटक के रहने वाले हैं। कम बोलते हैं पर काम गंभीरता से करते हैं। कभी कभी मजाक भी करते हैं। मेरे जाने के बाद सद्भावना रेल यात्रा में दफ्तर का काम वही देखने लगे। सदभावना रेल यात्रा के दूसरे चरण में भी वे रजिस्ट्रेशन का काम देख रहे थे।



पटना की सड़क पर सदभावना की साइकिल चलाते सुनील भाई। 
सुबुद्धि- उनका पूरा नाम शशांक शेखर सुबुद्धि है। ओडिशा से आए हैं। हमारी उम्र के हैं। पढ़ाई छोड़ दी है। घर भी छोड़ दिया है। कहते हैं अब पूरे समय समाज सेवा करूंगा। आगे भविष्य कैसे चलेगा इसकी कोई चिंता नहीं है। अक्सर मुझसे लड़ाई हो जाती है। रणसिंह जी पूछते हैं कि तुम सुबुद्धि से इतना लड़ते क्यों हों। पर मैं क्या करूं मेरी जो उनसे नहीं पटती।

सुनील कुमार सेवक  पटना के सुनील कुमार सेवक राष्ट्रीय युवा योजना के पुराने कार्यकर्ता हैं। वे बाबा आम्टे की भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हो चुके हैं। उनका असली नाम सुनील कुमार शर्मा था पर कहते हैं कि बाबा आम्टे ने उन्हें नया नाम सेवक दिया। तब से यही उनकी उपाधि बन गई। पटना में रेलयात्रा के तीन दिनों तक शानदार स्वागत और कार्यक्रम प्रबंधन में उन्होंने दिन रात एक कर काम किया। सुनील भाई से मेरी पहली मुलाकात उत्तर काशी शिविर में हुई थी। उसके बाद वे बड़े भाई और गहरे दोस्त बन गए। सामने वाले की आलोचना मुंह पर कर देना और अपनी बातें बड़ी साफगोई से कहना उनकी खासियत है।  

भारत की संतान में नागराज
नागराज  बेंगलुरू के रहने वाले नागराज मूल रूप से अभिनेता हैं। वे दावा करते हैं कि रजनीकांत अमिताभ की फिल्म अंधा कानून में उन्होंने छोटी सी भूमिका की थी। बेंगलुरू शिविर में उनकी सुब्बराव जी से मुलाकात हुई। उसके बाद में कई शिविरों में गए और महात्मा गांधी सेवा आश्रम जौरा में भी कई माह रहे। जौरा में ही मेरी उनसे मुलाकात हुई। उन्हें लोग प्यार से नागू कहकर बुलाते हैं।  

 सदभावना रेलयात्रा में वे पूरे समय रहे। भारत की संतान में वे नियमित रूप से कोई न कोई भूमिका निभाते हैं। रंग बिरंगे कपड़े पहनने का उन्हें बड़ा शौक है। वे अपने कपड़ों का डिजाइन भी खुद की तैयार कराते हैं। फाकामस्त नागराज घर छोड़ चुके हैं। कई साल बाद दिल्ली की सड़कों पर मिल गए तो हाथ में कैमरा था और फोटोग्राफी करके अपना गुजारा कर रहे थे।

देवेंद्र पासवान - मूल रुप से बिहार के रहने वाले देवेंद्र दिल्ली के निजामुददीन शेड में रेलवे में चतुर्थ वर्ग में कार्यरत कर्मचारी हैं। सदभावना यात्रा के दौरान स्पेशल ट्रेन पर उनकी ड्यूटी रेलवे लगा दी है किसी भी तरह की रेलवे संबंधी समस्या को लेकर समन्वय करने के लिए। पर देवेंद्र को रेलयात्रियों का साथ इतना भा गया कि वे हमारी तरह यात्री ही हो गए। एक दिन उन्होंने कहा कि आप मेरा भी रेलयात्रियों जैसा आईडी कार्ड बना दो। मैंने बना भी दिया। कुछ महीने बाद रेलवे उन्हें वापस बुलाकर किसी और को भेजना चाहता था पर उन्होंने रेल यात्रा पर ही अपनी सेवा का विस्तार करा लिया और पूरे आठ महीने रेलगाड़ी के साथ ही रहे। 




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