Wednesday, September 10, 2014

एक बार फिर जम्मू में- आ अब लौट चलें ((57))

जम्मू की यात्रा में सुब्बराव जी के साथ। 
( पहियों पर जिंदगी-56)
सदभावना रेल यात्रा का तीसरा चरण 1995 में शुरू हुआ था। अब मैं दिल्ली में आकर भारतीय जन संचार संस्थान में पत्रकारिता में डिप्लोमा की पढ़ाई कर रहा था। इसलिए तीसरे चरण में जाने का मौका नहीं मिल सका था। पर अक्तूबर महीने में ट्रेन का समापन दिल्ली के सफदरजंग रेलवे स्टेशन पर होना था, जहां से ट्रेन की शुरुआत हुई थी। मैं एक दिन पहले के पड़ाव फरीदाबाद पहुंच गया, ताकि यात्रा और यात्रियों के संग एक दिन गुजार सकूं और अखबारों के लिए कुछ फीचर और आलेख आदि लिख सकूं। सुबह सुबह फरीदाबाद में रेल पहुंची। ट्रेन का स्वागत हुआ। इसके बाद 


सुब्बाराव जी से मुलाकात हुई तब पता चला कि ट्रेन का आखिरी पडाव से पहले कार्यक्रम में थोड़ा बदलाव हुआ है। अब आज रात को ट्रेन जम्मू जा रही है। वहां दो दिन के ठहराव के बाद दिल्ली वापस आएगी। अब मुझे एक बार फिर जम्मू जाने का मौका मिल रहा था। इस बार मैं ट्रेन में मेहमान की तरह था, दफ्तर संभालने की जिम्मेवारियों से मुक्त। सो मैंने सोचा कि अच्छा रहेगा वैष्णो देवी के दर्शन करने भी चला जाऊंगा। इसलिए मैं रेल यात्रा के साथ हो लिया। ट्रेन चल पड़ी। अगली सुबह सुब्बराव जी ने कुछ डिक्टेशन देने के लिए बुलाया। पिछली यात्राओं में कई बार मैं उनके खतों के जवाब लिखा करता था। इस बार मैंने चलती ट्रेन में सुब्बराव जी का एक साक्षात्कार भी लिया जो बाद में दिल्ली प्रेस की युवाओं की पत्रिका मुक्ता में प्रकाशित हुआ। 
ट्रेन एक बार फिर जम्मू में थी। पिछली बार मैं जम्मू शहर पूरा घूम चुका था इसलिए इस बार कार्यक्रमों में हिस्सा लेने में कोई रूचि नहीं थी। सो मैं अकेला वैष्णो देवी के लिए निकल गया। जम्मू से बस से कटरा और कटरा पदयात्रा करते हुए चढ़ाई शुरू कर दी। इस चढ़ाई में चलते कुछ दोस्त बन गए। वे लोग इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद जम्मू में हाइड्रो प्रोजेक्ट में बतौर इंजीनियर काम कर रहे थे। अक्तूबर का महीना... रास्ते में गुनगुनी ठंड। माता के दर्शन आसानी से हो गए। जब दर्शन के बाद लौट रहा था, तब छिंदवाड़ा के प्रवीण कुमार बागड़ी समेत तमाम रेल यात्री भी वैष्णो देवी के लिए चढाई करते मिले। पता चला कि रेल यात्रा में एक दिन का अवकाश सभी यात्रियों को माता वैष्णो देवी की यात्रा के लिए दे दिया गया है।

इस बार की जम्मू यात्रा में यश शर्मा जी से मुलाकात नहीं हो सकी, पर उनकी याद बहुत आई। उनका गीत याद आया जो राष्ट्रीय एकता और सदभावना के संदेश को पूरी तरह से ज्ञापित करता है। हम उनके साथ ये गीत बेंगलुरु शिविर में और सदभावना रेल यात्रा में गुनगुनाते थे। तो सुनिए वो गीत


एकता एकता एकता एकता का दीया 
इस जमीं पे सदा जगमगता रहे
आदमी, आदमी के लिए प्यार के गीत
बुनता रहे, गुनगुनाता रहे।  एकता...
रंग और नस्ल का भेद बेकार है
आदमियत वहां जहां प्यार है...
भाईचारे का बंधन न टूटे कभी
वक्त चाहे हमें आजमाता रहे। एकता...
फल फूल आएगा, पेड़ इतेहाद का
हम अगर एक हैं, हुश्न है ताज का
मादरे हिंद तेरा हर एक पासवां
तेरी अजमत के ही गीत गाता रहे। एकता....
लाख तूफां आए चले आंधियां
आसमां से कौंधे बिजलियां
अपना अज्मे जमां साथियों दोस्तों
कठिन घड़ियों में भी मुस्काराता रहे।
एकता एकता.....
( गीतकार यश शर्मा, 24 पी, गांधीनगर जम्मू)
सदभावना रेल यात्रा का सफर बस इतना ही....जीवन के फिर किसी मोड़ पर मुलाकात होगी। सायोनारा...सब्बा खैर...

 - विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 


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