Monday, September 8, 2014

बनवासी सेवा आश्रम रेणुकूट में ((55))

बनवासी सेवा आश्रम में भारत की संतान की प्रस्तुति। (1994) 
(पहियों पर जिंदगी 54) 
सदभावना रेल यात्रा का पहला चरण मई 1994 में दिल्ली में खत्म होने के बाद 1994 में  ही  दूसरा चरण शुरू हो गया। इसका कुल मार्ग पहले चरण की तुलना में छोटा था। इस बार रेल की शुरुआत गाजियाबाद रेलवे स्टेशन से हुई । पर इस बार मैं यात्रा में पढ़ाई की व्यस्तताओं के कारण नहीं जा सका।


रेनुकूट आश्रम में, पगड़ी किसी साथी ने दी थी

ट्रेन जब इस चरण में वाराणसी में रुकी तो अजय पांडे जी के साथ मैं स्थानीय आयोजकों की मंडली में स्वागत समिति में स्वंयसेवक की भूमिका में रहा। पर वाराणसी से चलने के बाद कुछ दिनों के लिए ट्रेन पर सवार हो गया। इस बार मैं यात्री था। वही सद्भावना रेल है, जो पहले चरण में थी। ट्रेन में कुछ नहीं बदला है, साइकिलें वहीं हैं, पर सवार बदल गए हैं। राही बदल गए हैं, शहर बदल गए हैं। वाराणसी से चलकर हमारी ट्रेन रेणुकूट में रूकी। रेणुकूट हिंडालको का शहर है। यूपी का बड़ा औद्योगिक शहर।

यहां हमारी यात्रा बनवासी सेवा आश्रम में पहुंची। ये आश्रम प्रेम भाई द्वारा स्थापित किया गया था। प्रेम भाई अब इस दुनिया में नहीं रहे। वाराणसी में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सर सुंदरलाल चिकित्सालय में उपचार के दौरान मेरी उनके एक बार मुलाकात हुई थी। सामाजिक कार्यकर्ता श्री मोहन शुक्ला जी ने मुझे उनसे मिलवाया था। रेणुकूट में मोहन शुक्ला जी से मेरी एक बार फिर मुलाकात हुई। उनकी पत्नी इसी आश्रम में रहती हैं। जिंदादिल सामाजिक कार्यकर्ता मोहन शुक्ला जी से मेरी पहली मुलाकात एनवाईपी के अलीगढ़ शिविर ( सितंबर 1991) में हुई थी। तब उन्होंने हमें एक बांग्ला समूह गान सिखाया था।


डॉ रागिनी प्रेम( 1934-2014)
बनवासी सेवा आश्रम आसपास के गांवों में समाजसेवा के दर्जनों प्रकल्प चलाता है। प्रेम भाई की पत्नी डाक्टर रागिनी प्रेम अब इस अभियान को आगे बढा रही हैं। रागिनी बहन की भी एक कहानी है। एमबीबीएस की पढ़ाई करने के बाद वे चिकित्सक बन गईं। यानी वे रागिनी बहन मूल रूप से डाक्टर थीं। पर पीड़ित मानवदा दर्द उनसे देखा नहीं गया। वे प्रेम भाई के समाज सेवा के विचारों से प्रभावित होकर उनके साथ विवाह करके आ गईं। इसके बाद अपना सारा जीवन समाजसेवा के नाम कर दिया। 2014 में रागिनी बहन भी नहीं रहीं।

आज प्रेम भाई नहीं हैं पर आश्रम की गतिविधियां बदस्तूर जारी हैं। अगर किसी को गांधीवादी तरीके से समाजसेवा के प्रकल्पों पर काम आगे बढ़ता हुआ देखना हो तो वह रेणुकूट के इस आश्रम को देख सकता है।

शाम की सर्व धर्म प्रार्थना सभा में रागिनी बहन ने हमें आश्रम की गतिविधियों से रुबरू कराया। हमारा एक दिन का प्रवास इसी आश्रम में रहा। रात्रि भोजन और सदभावना रेल यात्रा के यात्रियों का रात्रि विश्राम का इंतजाम भी आश्रम में ही था।


इस दौरान हम यहां आश्रम के कार्यकर्ताओं से भी मिले। इनके परिवार समेत रहने का इंतजाम और बच्चों के पढने की व्यवस्था आश्रम की ओर से की जाती है। यहां हमें बिहार के पूर्णिया जिले के रहने वाले शबरी मंडल मिले जो आश्रम के कार्यकर्ता हैं और परिवार समेत यहीं रहते हैं। वे हमें सुबह के नास्ते पर अपने घर ले गए। अपने पूरे परिवार से मुझे मिलवाया। रेणुकूट से जब ट्रेन चलने लगी तो आश्रम के तमाम कार्यकर्ता रेलवे स्टेशन पर हमें छोड़ने आए। मंडल जी तो साथ छूटते हुए भावुक हो गए। ऐसा लगा जैसे एक दिन में हम परिवार के सदस्य जैसे बन गए हों।


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