Tuesday, September 2, 2014

सदभावना रेल यात्रा हाजीपुर में ((48))

(पहियों पर जिंदगी 48)
सोनपुर से हाजीपुर की ओर बढ़ती सदभावना रैली। 
27 नवंबर 1993  सद्भावना स्पेशल ट्रेन देर रात में चलकर सोनपुर रेलवे स्टेशन पहुंच चुकी थी। आपको पता है सोनपुर रेलवे स्टेशन का प्लेटफार्म संसार में सबसे लंबा हुआ करता था। अब खड़गपुर और गोरखपुर इससे भी लंबे हो गए हैं। सोनपुर में हमारे यूनिट के साथी नीरज चंद्र मिश्र, रजनी कुमारी, हमारे यूनिट की बहनें ऋतंभरा, कनकलता, भाई स्वंय प्रकाश और दर्जनों साथी रेलवे स्टेशन पर पहुंच गए थे। पर ठहराव हाजीपुर से सोनपुर हो जाने के कुछ साइड इफेक्टस दिखाई देने शुरू हो गए।

हमारे एक साथी जो सुबह का नास्ता अपने दफ्तर में कराना चाहते थे उनकी जिद थी कि यात्रा दफ्तर में चलेगी वहीं नास्ता होगा। मैंने उन्हें कहा था कि अब ट्रेन सोनपुर रूक रही है तो यात्रियों को बिना नास्ता दिए आठ किलोमीटर चलाना ठीक नहीं होगा। जब उन्होंने नास्ते लाने से इनकार किया तो हमने सोनपुर बाजार से तुरंत 200 यात्रियों के लिए नास्ते इंतजाम कर डाला। सोनपुर जंक्शन पर रैंप नहीं होने के कारण रेलयात्रा की जीप को रेलगाड़ी से नहीं उतारा जा सका। इसलिए रैली के लिए मुझे स्थानीय जीप का इंतजाम करना पड़ा।
 


सोनपुर जंक्शन पर सभी रेल यात्रियों का रोली चंदन का टीका लगाकर स्वागत किया गया। वैशाली जिले के जिलाधिकारी उदय प्रताप सिंह जी ने रेलवे स्टेशन पर यात्रियों का स्वागत किया और हरी झंडी दिखाई। वे बड़े सहृदय आईएएस अधिकारी थे। सामाजिक संस्थाओं और गरीबों के लिए वे हमेशा उपलब्ध रहते थे। मैं वैशाली जिला नेहरु युवा केंद्र सलाहकार समिति का सदस्य था, और इन बैठकों में भी उनकी सक्रियता देख चुका था।
सोनपुर से सदभावना रैली शुरू होकर रेलवे कालोनी, रजिस्ट्री बाजार, शहीद महेश्वर चौक, सोनपुर मेल क्षेत्र होती हुई पुराना गंडक पुल पार कर हाजीपुर पहुंची। रैली में सबसे आगे सुब्बराव जी जीप पर होते हैं। इसके बाद क्रम से नर्मदा कोच की बहनें, इसके बाद यमुना, गंगा, सिंधू, झेलम, सरयू, गोदावरी, यानों में रहने वाले स्वयंसेवक चलते हैं। रेल यात्रा के दौरान देश भर से आए लोगों की पहचान उनके कोच से होती है। हर कोच का एक प्रभारी होता है जो अपने कोच के लोगों के अनुशासन का ख्याल रखता है।

सोनपुर हाजीपुर के बीच गंडक नदी पर बने रेल कम रोड ब्रिज से गुजरती सदभावना रैली। 

27 नवंबर 1993  सद्भावना स्पेशल ट्रेन देर रात में चलकर सोनपुर रेलवे स्टेशन पहुंच चुकी थी। आपको पता है सोनपुर रेलवे स्टेशन का प्लेटफार्म संसार में सबसे लंबा हुआ करता था। अब खड़गपुर और गोरखपुर इससे भी लंबे हो गए हैं। सोनपुर में हमारे यूनिट के साथी नीरज चंद्र मिश्र, रजनी कुमारी, हमारे यूनिट की बहनें ऋतंभरा, कनकलता, भाई स्वंय प्रकाश और दर्जनों साथी रेलवे स्टेशन पर पहुंच गए थे। पर ठहराव हाजीपुर से सोनपुर हो जाने के कुछ साइड इफेक्टस दिखाई देने शुरू हो गए।

हमारे एक साथी जो सुबह का नास्ता अपने दफ्तर में कराना चाहते थे उनकी जिद थी कि यात्रा दफ्तर में चलेगी वहीं नास्ता होगा। मैंने उन्हें कहा था कि अब ट्रेन सोनपुर रूक रही है तो यात्रियों को बिना नास्ता दिए आठ किलोमीटर चलाना ठीक नहीं होगा। जब उन्होंने नास्ते लाने से इनकार किया तो हमने सोनपुर बाजार से तुरंत 200 यात्रियों के लिए नास्ते इंतजाम कर डाला। सोनपुर जंक्शन पर रैंप नहीं होने के कारण रेलयात्रा की जीप को रेलगाड़ी से नहीं उतारा जा सका। इसलिए रैली के लिए मुझे स्थानीय जीप का इंतजाम करना पड़ा।
 

सोनपुर जंक्शन पर सभी रेल यात्रियों का रोली चंदन का टीका लगाकर स्वागत किया गया। वैशाली जिले के जिलाधिकारी उदय प्रताप सिंह जी ने रेलवे स्टेशन पर यात्रियों का स्वागत किया और हरी झंडी दिखाई। वे बड़े सहृदय आईएएस अधिकारी थे। सामाजिक संस्थाओं और गरीबों के लिए वे हमेशा उपलब्ध रहते थे। मैं वैशाली जिला नेहरु युवा केंद्र सलाहकार समिति का सदस्य था, और इन बैठकों में भी उनकी सक्रियता देख चुका था।
सोनपुर से सदभावना रैली शुरू होकर रेलवे कालोनी, रजिस्ट्री बाजार, शहीद महेश्वर चौक, सोनपुर मेल क्षेत्र होती हुई पुराना गंडक पुल पार कर हाजीपुर पहुंची। रैली में सबसे आगे सुब्बराव जी जीप पर होते हैं। इसके बाद क्रम से नर्मदा कोच की बहनें, इसके बाद यमुना, गंगा, सिंधू, झेलम, सरयू, गोदावरी, यानों में रहने वाले स्वयंसेवक चलते हैं। रेल यात्रा के दौरान देश भर से आए लोगों की पहचान उनके कोच से होती है। हर कोच का एक प्रभारी होता है जो अपने कोच के लोगों के अनुशासन का ख्याल रखता है।

हाजीपुर में हमारा पहला पड़ाव स्काउट के शिविर में था। यहां यात्रा का स्वागत सियाराम सिंह ने किया। बच्चों ने स्काउट ताली और फूलों से देश भर से आए लोगों का स्वागत किया। यात्रा का एक हिस्सा नवोदय विद्यालय दिघी भी गया। हाजीपुर शहर के कई हिस्सों से सदभावना रैली गुजरती हुई शाही कालोनी पहुंची। यहां हमारे साथी अजय कुमार संटू और अभय कुमार पिंटू ने नास्ते का इंतजाम किया था। हमारी दोपहर की सभा प्रेम उच्च विद्यालयढ़ुआ में हुई। यहां सभी यात्रियों के एक एक खादी का रुमाल उपहार में मिला।
पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक रेल यात्रा नवोदय विद्यालय दिघी में भी जाने वाली थी, पर ठहराव हाजीपुर से सोनपुर हो जाने पर हमें दिघी तक रैली ले जाने का कार्यक्रम बदलना पड़ा। पर एक जीप से सुब्बराव जी और कुछ साथियों को नवोदय विद्यालय में भेजा गया। इस बीच रैली हाजीपुर की सड़कों पर चलती रही। 

अलग अलग घरों में भोजन - हाजीपुर में हमने दोपहर के भोजन का इंतजाम लुधियाना और पठानकोट की तर्ज पर अलग अलग घरों में किया था। एक मेजबान के घर में दो या चार यात्री। ये सुंदर प्रयोग है। आप जिसके घर जाते हैं उससे आपका स्थायी परिचय होता है। साथ ही एक जगह 200 लोगों के भोजन बनवाने का खर्च भी बच जाता है।

मेरे माता-पिता और सभी भाई बहन रेलयात्रा की आगवानी में व्यस्त थे इसलिए हमने अपने घर किसी को भोजन कराने का इंतजाम नहीं रखा था। पर रेल यात्रा के दौरान हमारे कुछ दोस्त बने थे जो इस जिद पर अड़ गए कि हम तो आपके घर ही चलेंगे। तो ओडिशा के मधु भाई समेत कई लोग मेरे घर पहुंच गए। रणसिहं जी और सुब्बराव जी भी अलग अलग घरों में गए।


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