Thursday, September 11, 2014

सदभावना के साथी- जिन्हें भूला न पाएंगे ((58))

अंबाला में द्वारकानाथ, मधु भाई, गगन, पुनीत, अमन, विद्युत, देवेंद्र गौड़।
(पहियों पर जिंदगी 57 )
जिंदगी सदभावना की रेल नहीं हो सकती। पर इस सफर के कई साथी बहुत याद आते हैं। ऐसे साथी जो नींव के ईंट की तरह हैं। सदभावना रेल यात्रा के संचालन और अनुशासन बनाए रखने में उनकी अपनी भूमिका महत्वपूर्ण रही। पर वे किसी तरह के प्रचार से दूर स्वंयसेवक के भाव से यात्रा में लगे रहे।  
देवेंद्र गौड़ -  देवेंद्र भाई झांसी से आए थे। उनसे मेरी मुलाकात सदभावना यात्रा के आधार शिविर में नई दिल्ली के रेलवे स्टेडियम में हुई। वे एमबीए की पढ़ाई कर रहे हैं। तेज तर्रार और स्मार्ट देवेंद्र ने कार्यालय व्यवस्था और पंजीयन आदि का काम देखना शुरू किया है। वे हालांकि शुरुआत के 20 दिनों तक ही यात्रा में रहे। अंबाला से वे वापस लौट गए। उसके बाद दफ्तर चलाने, रजिस्ट्रेशन आदि का जिम्मा मुझे सौंप गए। मैंने दिल्ली से ही उनके काम में सहायता करनी शुरू कर दी थी।



मधुसूदन दास  मधूसूदन दास ओडिशा के कटक के पास के रहने वाले हैं। वे पूर्णकालिक समाजसेवक हैं। आजकल एनवाईपी के साथ काम कर रहे हैं। लोग मधु भाई को मिनी भाईजी कहते हैं। ऐसा इसलिए कि वे भाई जी से प्रेरणा लेकर उनकी तरह ही निक्कर और खादी की बुशर्ट पहनते हैं। मधुभाई से मेरी मुलाकात पहली बार 1992 में दिल्ली में यूथ वर्कर्स मीट के दौरान हुई थी। इसके बाद उनसे जौरा आश्रम में भी मिलना हुआ। वे बड़े कुशल संगठक और मंच संचालक हैं। जरूरत पड़ने पर गुस्सा भी कर लेते हैं। कदकाठी से दुबले पतले हैं। कभी कभी वे कहते हैं कि आखिर मैं कैसा खाना खाउं कि मेरे गाल भी रणसिंह परमार की तरह लाल लाल हो जाएं।


द्वारकानाथ  कर्नाटक के मैसूर के रहने वाले द्वारका नाथ देखने में ही हंसोड़ और मजाकिया किस्म के व्यक्ति नजर आते हैं। रेल यात्रा आरंभ होने पर उन्हें अन्नपूर्णा यानी रसोई यान की जिम्मेवारी सौंपी गई। हालांकि रेलयात्रा में सारे रास्ते नास्ते और भोजन की व्यवस्था तो स्थानीय आयोजक करते हैं पर कई जगह ट्रेन सुबह में चलती है। तब अन्नपूर्णा से चाय बनती और नास्ता बनाकर यात्रियों को दिया जाता है। इसमें यात्री स्वंयसेवा के भाव से मदद करते हैं। हालांकि अन्नपूर्णा कोच में दिन या रात का पूरा भोजन बनाने का भी इंतजाम है, पर यात्रा के दौरान इसकी नौबत कम ही आई। द्वारकानाथ भाई का रसोई के इंतजाम में सहयोग देते हैं ओडिशा के भाई बनमाली। बनमाली संतों सी वेशभूषा में रहते हैं। एक दिन मुझे पता चला कि वे सज्जन व्यक्ति एमए पास हैं।

आनंद दिनकर पंडित- आनंद पंडित मूल रूप से मराठी हैं पर वे ग्वालियर शहर के रहने वाले हैं। उनसे हमारी मुलाकात बेंगलुरू में आध्यात्मिक युवा शिविर के दौरान हुई थी। वहां वे सुबह सुबह जागरण गीत आ गया...आ गया...जागने का वक्त आ गया...गाते थे जिसे हजारों लोग पीछे से दुहराते थे। दिन भर आनंद भी जहां मिलें शिविरार्थी उन्हें देखकर बस आ गया...बोलते थे। आनंद भाई बाबा आम्टे के भारत जोड़ो यात्रा में रह चुके हैं। उन्हें राष्ट्रीय एकता से जुड़ी यात्राएं करने का पुराना अनुभव है। सदभावना यात्रा में रैली संचालन में कमांडर जैसी भूमिका निभाते हैं।

-    vidyutp@gmail.com  
( DEVENDRA GAUR, DWARKANATH, MADHUSUDAN DAS, ANAND PANDIT, LIFE ON WHEELS )


सदभावना रेल यात्रा का वृतांत शुरू से पढ़ने के लिए यहां पर क्लिक करें। 

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