Wednesday, September 24, 2014

जब बारह लाख की आबादी का दुनिया से संपर्क टूटा ((12))

( जन्नत में जल प्रलय - 12 )
-    श्रीनगर एयरपोर्ट जाने के तीनों रास्ते बंद

-    जम्मू श्रीनगर हाइवे पहले से ही है बंद

-    और पूरी तरह डूब गया मेराजुद्दीन नगर

अपना वैष्णो ढाबा की रविवार 7 सितंबर की सुबह। हम कहवा पी रहे थे। तभी एक सरदार जी आए। श्रीनगर में व्यापार करते हैं। मेराजुद्दीन नगर में उनका घर है। उन्होंने बताया कि बताया कि रात में अचानक आए पानी से उनके घर की दो मंजिले डूब गई हैं। वे जान बचाने के लिए परिवार के साथ छत पर खड़े थे। कुछ घंटे पहले नाव से रेस्कयू करके उन्हे निकाला गया। डल गेट इलाका ऊंचाई पर इसलिए यहां उन्होंने शरण ली है। वे अपने परिवार के लिए पराठे पैक करा रहे थे। सरदार जी रूआंसे हो रहे थे। बताया कि सारा सामान घर में छोड़ कर आया हूं। पता नहीं सब कुछ सुरक्षित वापस मिलेगा या नहीं। उन्हें डर था कि पानी में डूबे हुए घर में लोग नाव से चोरियां भी कर रहे हैं। उनके मुहल्ले में पानी बढ़ता जा रहा है। दो मंजिले पूरी तरह डूब चुकी हैं। तीसरी मंजिल भी डूबती जा रही है। मुहल्ले के तमाम लोग अपना आशियाना छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर भाग रहे हैं।


सरदार जी बता रहे हैं कि हमने अपने जीवन में ऐसी आपदा कभी नहीं देखी। अब तक हमें यही जानकारी मिल रही थी श्रीनगर शहर के निचले इलाके पानी में डूब रहे हैं।  हालांकि खतरा इससे कहीं ज्यादा बढ़ चुका था जिसका हमें एहसास नहीं था।
आफताब वानी सड़क पर जाकर हालात की जानकारी लेने गए। थोड़ी देर बाद हमें पता चला कि श्रीनगर शहर से एयरपोर्ट जाने के तीनों रास्ते बंद हो चुके हैं। जम्मू श्रीनगर हाइवे तो पहले से ही बंद है। श्रीनगर के आसपास पहलगाम, गुलमर्ग, सोनमर्ग, कुपवाड़ा, सोपियन के रास्ते भी बंद हो चुके हैं। यानी शहर की साढ़े 12 लाख आबादी का संपर्क अब बाकी दुनिया से कट चुका है।
हम एक बड़े खतरे में फंस चुके थे। सबके मन में चिंता थी यहां से निकलेंगे कैसे। और इस दौर में खाएंगे क्या...जिंदगी हमें कौन सा रंग दिखा रही है...चिंता में दोपहर हो गई। 

खाने का स्टाक खत्म हुआ -  पेट में चूहे कूद रहे थे। खोनाखान रोड पर पेसफिक होटल के ठीक बगल से हमारे होटल का रास्ता नीचे आता था। वहां एक ढाबा था तुआम फूड सर्विसेज। जहां सौ रुपये की थाली थी। वहां दोपहर का खाना मिल रहा था। हमने वहां दो थाली आर्डर की। हरी सब्जियां नहीं थीं। स्टाक खत्म हो चुका था। दाल चावल और रोटी खाने में मिली। श्रीनगर के किसी ढाबे में हमारा वह आखिरी भोजन था। ढाबे वाले को मालूम था कि बड़ा खतरा आ चुका है। पर उसने खाने की दरें नहीं बढ़ाई थीं। उसने बताया कि हमारे पास शाम के लिए कोई स्टाक नहीं है इसलिए वह लोगों को रात का डिनर नहीं उपलब्ध करा पाएगा।

सारा दिन आसन्न संकट को लेकर आपस में चिंता करते हुए गुजरा। शाम हुई तो अंधेरा छा गया था। पूरे शहर की बिजली गुल थी। वानी साहब कहीं से तीन मोमबत्तियां लेकर आए थे। उनमें से एक उन्होंने हमें दीं। माधवी का नोकिया टार्च मोबाइल अंधेरे में डूबे धरती के स्वर्ग में हमारा बड़ा सहारा था।

-    ---  विद्युत प्रकाश मौर्य   


(FLOOD, KASHMIR ) 

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