Monday, October 6, 2014

हसरत भरी निगाहें आसमां की ओर

( जन्नत में जल प्रलय 21 )

एक होटल में फंसे 250 से ज्यादा लोग। किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा कि हमें कौन इस मुश्किल से निकाल सकता है। आखिर हमें मदद कहां से मिलेगी। कई लोगों ये सोच कर उदास हो जा रहे हैं कि यहां से निकलना संभव हो सकेगा या नहीं। बार बार निगाह आसमान की ओर जाती है। सभी इंद्र देवता से प्रार्थना करने में लगे हैं कि अब और मत बरसना, नहीं तो पानी का स्तर शहर में एक बार फिर बढ़ने लगेगा। आठ तारीख की रात 11 बजे आसमान में बादल छा गए। एक आध बूंदे टपकी होंगी कि चारों तरफ से पानी से घिरे लोगों के मन में डर बढ़ने लगा। पर थोड़ी देर में बादल छंट गए बारिश नहीं आई। राहत मिली।


हमारे होटल की तीसरी मंजिल के बरामदे से एक रास्ता है जो बगल के होटल आमिर की छत से जुड़ता है। खुली छत है पर उसके चारों तरफ बाउंड्री नहीं है। सुबह होने पर तमाम लोग इस छत पर जुट जाते हैं। आपस में एक दूसरे से दर्द साझा करते हैं। संकट की इस घड़ी में किसी को थोड़ा हंसी मजाक भी सूझता है। तो कोई यहां से बचने का अलग अलग रास्ता सुझाता है। हमारी नजर आसमान की ओर जाती है। सेना के विमान कई बार आसमान में आते जाते दिखाई देते हैं। कुछ लोग सुझाव देते हैं कि हम इन विमान को अपनी ओर आकर्षित करने को कोई जुगत भिड़ाते हैं। आखिरी हवा में उडने वाले विमान तक संदेश कैसे पहुंचे...कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि आग जलाओ। पर आग जलाने से विमान को पता चल जाएगा कि यहां लोग संकट में हैं। पर हमारे पास आग जलाने का कोई उपाय नहीं था। कुछ महिलाओं ने सुझाव दिया कि लाल चुन्नी का झंडा बनाकर आसमां में लहराया जाए। शायद विमान उड़ा रहे पायलट को हम नजर आ जाएं। दिन में कई घंटे तक एक डंडे में लाल रंग की चुन्नी बांध कर महिलाएं लहराती रहीं। आसमान की ओर हसरत भरी निगाहों से देखती रहीं। शायद किसी विमान को हमारे संकट में घिरे होने की खबर मिल जाए। पर ऐसा हुआ नहीं। किसी भी विमान को हम अपनी ओर आकर्षित करने में सफल नहीं रहे। पर अपनी असफलताओं पर हम निराश नहीं हुए। सरस मेले में हिस्सा लेने आए 250 लोगों में से कई लोगों ने हमारी इस कोशिश का मजाक भी उड़ाया पर इससे कोशिश करने वाले हार नहीं माने।


अगर आपदा में फंसे हों तो पहली सबसे बड़ी जरूरत धीरज धारण करना होता है। मुश्किल घड़ियों में अपना दिमाग ठीक रखना और पहली जरूरत होती है। देश भर के 22 राज्यों से आए होटल में मौजूद सभी लोग एक दूसरे का सहयोग कर रहे थे। हांलाकि कई लोग इसमें निराश हो जा रहे थे। पर दूसरे उत्साही लोग उन्हें ढाढस बंधाने में जुट जाते थे कि आप परेशान न हों। हमलोग इस संकट से सफलतापूर्वक बचकर निकल जाएंगे और अपने घरवालों के पास एक दिन सकुशल पहुंचेंगे। हालांकि वह दिन कब आएगा ये किसी को मालूम नहीं था।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

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