Sunday, October 5, 2014

सीआरपीएफ के जवान आए... पर ले जाएं तो कहां

( जन्नत में जल प्रलय 20 )
आठ सितंबर की सुबह मुख्य सड़क को पार कर आ रहा पानी हमारे होटल में भरता जा रहा था। हम चारों तरफ से धीरे धीरे डूबते जा रहे थे। आफताब वानी माहौल पता करने के लिए बाहर जा चुके थे। शामली से सरस मेले में हिस्सा लेने आए सरवर अंसारी और उनके साथी भी बाहर निकलने का कोई जुगत भिड़ाने में लगे थे। मैं भी बाहर निकलन कर माहौल पता करना चाहता था। पर मुझे तैरना नहीं आता। माधवी ने मना किया कि आप मत जाओ पानी तेज गति से आ रहा है खतरा हो सकता है। मदद के लिए दिल्ली फोन करने का कोई ऊपाय नहीं था। सरवर अंसारी के पास जितने फोन थे उससे रात भर वे एसएमएस करने की कोशिश में लगे रहे, पर कोई सफलता नहीं मिल पाई थी।

साहस करके सरवर अंसारी और उनके साथी तेज गति से आ रहे पानी की धारा से बाहर निकल कर सड़क पर पहुंचे। उनके साथ रामपुर के मसूद भाई भी बाहर निकले। होटल ममता के पास सीआरपीएफ की 21 बटालियन का मुख्यालय था। मैंने साथियों को सलाह दी थी कि आप उस बटालियन में जाकर बताना कि रिटज होटल में देश भर से आए 250 लोग फंसे हैं।शायद वे लोग हमारी कुछ मदद कर सकें। हमारी ये सलाह काम भी आई। जानकारी मिलने का बाद आठ दस सीआरपीएफ के जवान रस्सियां आदि लेकर हमारे होटल में तुरंत पहुंच गए। उन्होंने कहा कि हम सारे लोगों को इस होटल से रस्सियों की मदद से निकालने के लिए आए हैं। पर जानकारी लेने पर पता चला कि वे हमें निकालकर खुली सड़क पर छोड़ देंगे। उनके पास किसी राहत शिविर का पता नहीं है जहां वे हमें पहुंचा सकें।
ऐसे हालात में ज्यादातर लोगों ने होटल छोड़कर बाहर जाने से इनकार कर दिया। हमारे होटल के प्रबंधक एजाज भाई तो हमारे लिए दाना पानी का इंतजाम करने को तैयार थे। फिर हम क्यों जाएं होटल छोड़कर सड़क पर। सीआरपीएफ के जवान हमारे इनकार पर वापस लौट गए। हमने उन्हें बताया हमारे पास खाने को कुछ नहीं है। जवानों ने अपनी विवशता बताई कि हमारे कैंप में भी पानी घुस आया है। हम खुद मुश्किल में हैं। हमारे पास और लोगों को शरण देने के लिए जगह नहीं है।  जाहिर सी बात है जब सीआरपीएफ की बटालियन खुद संकट में थी तो वे हमारी क्या मदद कर पाते। उनका संचार तंत्र भी ध्वस्त हो गया था। अपने मुख्यालय संपर्क करने का उनके पास कोई साधन नहीं था।

थोड़ी देर बाद जो लोग पानी में घुस कर बाहर गए थे वे लोग भी निराश होकर वापस लौट आए। उम्मीद थी कि बाहर कुछ खाने पीने को मिल जाएगा। पर दूर दूर तक कोई दुकान नहीं खुली थी। कहीं से किसी को बिस्कुट के कुछ पैकेट मिल गए थे जिन्हें हमारे साथ मौजूद उन परिवारों को जिनके पास बच्चे थे उनके बीच बांट दिया गया। एक बार फिर सारे लोग बाहर निकलने के लिए कोई तरीका ढूंढने में लग गए। पर किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

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