Thursday, September 4, 2014

लीची के शहर मुजफ्फरपुर में ((50))


(पहियों पर जिंदगी 50)
28 नवंबर 1993  रात में सोनपुर से रात में ट्रेन चलकर मुजफ्फरपुर पहुंच गई। दोनों शहरों के बीच की दूरी 50 किलोमीटर है। मुजफ्फरपुर वह शहर है जहां मैंने सातवीं आठवीं और 11वीं, 12वीं की पढ़ाई की है। मुजफ्फरपुर में राष्ट्रीय युवा योजना की सक्रिय इकाई है। हमारे पुराने साथी डाक्टर एके अरुण अब दिल्ली जा चुके हैं। रेल यात्रा के स्वागत की जिम्मेवारी अशोक भारत, लाल बाबू सिंह और साथियों के जिम्मे है। बिहार विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय सेवा योजना के समन्वयवक प्रोफेसर वीके जायसवाल, नेहरू युवा केंद्र की समन्वयक ज्योत्सना जी भी काफी सक्रिय हैं। हमारी पूसा की बहनें मीनाक्षी, कामाक्षी, स्निग्धा आदि भी यहां के सक्रिय लोगों में हैं।

हाजीपुर में कई दिनों तक स्वागत की तैयारी की थकान मेरे ऊपर हावी थी। इसलिए मैं रेलगाड़ी में  28 नवंबर की सुबह देर तक सोता रहा। मुजफ्फरपुर के स्थानीय आयोजनों में हिस्सा लेने नहीं जा सका। मुजफ्फरपुर में प्लेटफार्म नंबर एक पर काम चल रहा था इसलिए सदभावना यात्रा को आखिरी प्लेटफार्म दे दिया गया है। इससे लोग ट्रेन को देखने नहीं आ पा रहे हैं।


दोपहर के बाद अचानक देखा एक बड़ी गाड़ी से सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डाक्टर बिंदेश्वर पाठक अपने सहयोगियों के साथ पहुंचे। उन्हें मैंने सदभावना यात्रा से पत्र भेजा था। वे पटना में एक दिन रेल यात्रा के स्वागत का कार्यक्रम रखना चाहते हैं। मैंने उन्हें पटना में सुनील सेवक जी से समन्वय बनाने की सलाह दी। पाठक जी जहां चलते हैं उनके साथ एक फोटोग्राफर और एक सचिव साथ होता है। हर किसी से मुलाकात की वो तस्वीरें लेता रहता है। सुलभ आंदोलन के संस्थापक श्री पाठक वैशाली जिले के जंदाहा के पास के रामपुर बघेल गांव के रहने वाले हैं। सस्ते सुलभ शौचालय के निर्माण की तकनीक के लिए वे पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। वे सुब्बराव जी का काफी सम्मान करते हैं। शाम को रण सिंह परमार जी एक बार फिर ग्वालियर के लिए लौट गए। मैं भी उनके साथ हाजीपुर तक लौट आया। मुझे अपने हाजीपुर आयोजन का हिसाब किताब करना है। 
 मुजफ्फरपुर में दो दिनों के ठहराव के बाद ट्रेन का अगला पड़ाव 30 नवंबर को समस्तीपुर था। पहले समस्तीपुर में ट्रेन का ठहराव दो दिनों का था। पर मेरी बार बार मांग पर सुब्बाराव जी ने ट्रेन का एक दिन का ठहराव सोनपुर (हाजीपुर) किया और समस्तीपुर से एक दिन की कटौती थी।
 इसके बाद एक और 2 दिसंबर को ट्रेन बरौनी में रूकी। मुझे पटना में लिसी बरूचा मैडम ने बताया कि बेगुसराय जिले के जिलाधिकारी और एसपी ने रेल यात्रा के स्वागत में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। वे रेल यात्रियों के साथ शामिल होकर सड़कों पर नृत्य भी करने लगे। हालांकि बरौनी में बेगुसराय में हमारी संस्था एनवाईपी की नेटवर्क सक्रिय नहीं था पर वहां भी स्वागत में कोई कमी नहीं रही।


बिहार में जब से ट्रेन ने प्रवेश किया है बिहार के गांधीवादी शिवानंद भाई और हवलदार सिंह हलधर जैसे लोग सुब्बराव जी के साथ हो लिए हैं। हालांकि स्थानीय आयोजन में उनका कोई खास सहयोग मुझे दिखाई नहीं दिया। मुझे हाजीपुर में भी पुराने गांधीवादी नेताओं से किसी तरह का रचनात्मक आर्थिक सहयोग नहीं मिल पाया। मैंने ये देखा कि जिस तरह पठानकोट में यशपाल मित्तल जी का लोगों के बीच प्रभाव था उस तरह का प्रभाव गांधीवादियों और सर्वोदय के लोगों का बिहार में नहीं है।


No comments:

Post a Comment