Sunday, September 7, 2014

सेंड्रा... आजकल तुम कहां हो... ((54))

(पहियों पर जिंदगी 53)
सदभावना रेल यात्रा जहां भी रुकती है यात्रा के साथ चल रही जर्मन यात्री सेंड्रा और मारेन का खास तौर पर स्वागत होता है। इससे वे काफी खुश होती हैं। कई जगह तो लोग उन्हें फूलों से लाद देते हैं। कई जगह उन्हें मंच पर जगह दी जाती है। कुरुक्षेत्र के एक धर्मशाला में हमलोग रात को रुके। सुबह सुबह एक मेहंदी का डिजाइन बेचने वाला सबको मेहंदी लगा रहा था। सेंड्रा को जब हमलोगों ने बताया कि मेहंदी के प्रकार के पौधे की पत्तियां होती हैं, तब उसने भी मेहंदी रचाने की इच्छा जाहिर की। थोड़ी देर बाद जब उसके हाथ लाल हो गए तो वह काफी खुश होकर सबको अपना हाथ दिखा रही थी।

हिंदुस्तान वे छह माह के लिए आई हैं। इस दौरान दो महीने उन्होंने रेल यात्रा के साथ गुजारे। चंडीगढ़, पंजाब, जम्मू, देहरादून, हरिद्वार, बरेली, कानपुर, लखनऊ से इलाहाबाद तक वे रेलयात्रा के साथ रहीं।
हिंदुस्तान के युवक युवतियों से तुलना करें तो सेंड्रा और मारेन अपनी उम्र में ज्यादा आत्मनिर्भर और समझदार हैं। उन्हें को बेवकूफ नहीं बना सकता। अपना काम खुद करना दूसरों की सहायता कम से कम लेना उनका विशेषता है। अंबाला में सेंड्रा मामूली बीमार होने पर केमिस्ट की दुकान पर गई और अपनी दवा खुद लेकर आ गई। पर वह केमिस्ट से बिल बनवाना नहीं भूली। जर्मनी में अपेक्षाकृत ठंडे इलाके में रहने के कारण भारत की गर्मी उन्हे थोड़ा परेशान करती है। जब हरिद्वार और ऋषिकेश में थोड़ा ठंडा मौसम मिला तो वे काफी खुश हो गईं।


सेंड्रा ट्रेन की यात्रा के दौरान लगातार तस्वीरें खिंचती है और उन्हे आने वाले शहर के कलर लैब में डेवलप कराने के बाद अपने मम्मी पाता के डाक से भेज देती है। इस तरह उनका कुशल क्षेम और यात्रा रिपोर्ट उनके मम्मी पापा को मिलता रहता है। इन महीनों में हिंदुस्तान की आबोहवा और यहां के लोगों से उनका भावनात्मक संबंध जुड़ गया। ट्रेन छोड़ते समय वे काफी भावुक हो गईं। काश ऐसे शिविर और होते जिसमें दुनिया के अलग अलग देशों के युवाओं को एक दूसरे से मिलने का मौका मिलता तो सरहदों की दीवारें इतनी मजबूत कहां होतीं।

अपने छह माह के भारत प्रवास में सेंड्रा और मारेन चंबल क्षेत्र में स्थित महात्मा गांधी सेवा आश्रम जौरा भी गईं। इसके अलावा वे हिंदुस्तान के प्रमुख दर्शनीय स्थलों को देखने गईं। वे आंध्र प्रदेश और ओडिशा के कुछ गांवों में गईं। हिंदुस्तान से ढेर सारी यादें लेकर वे अपने देश जर्मनी लौंटी तो उनके कई दोस्त भी बन चुके थे जिन्हें वे खत लिखती रहीं। चुलबुली सेंड्रा से मेरी दोस्ती भी हो चुकी थी।
सेंड्रा की छोटी बहन की तस्वीर जो उसने मुझे डाक से भेजी थी।

जर्मनी पहुंचने के बाद भी सेंड्रा के कई खत आए। मेरे जन्मदिन पर वह कई साल तक कार्ड भेजती रही। उसने जर्मनी के अपने शहर का परिचय देने वाली पुस्तक मेरे पास भेजी। अपने घर. अपनी कार, अपने पिता और अपनी छोटी बहन की तस्वीरें डाक से भेजी। वह बड़े सुंदर खत लिखा करती थी।

 वह अपने जीवन की आगे की योजनाओं के  बारे में लिखती थी। पर मेरी पढ़ाई की वस्ततताओं के बीच सेंड्रा से खतो किताबत का सिलसिला एक दिन टूट गया।
आज जब साल 2014 में मैं उन्हे याद कर रहा हूं तो सेंड्रा और मारेन  भी 40 को पार कर गई होंगी। पर न जाने वह कहां हैं और क्या कर रही हैं। सेंड्रा के शहर सोएस्ट के बारे में और जानना हो तो यहां क्लिक करें। 


( SENDRA, GERMANY, SOEST , LIFE ON WHEELS ) 

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