Friday, September 5, 2014

बिहार की राजधानी पटना में सदभावना रेल ((51))

पटना जंक्शन पर यात्रा का स्वागत करते सुनील सेवक। 
(पहियों पर जिंदगी 51) 
3 दिसंबर 1993  तीन दिसंबर देश के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद का जन्मदिन है। पटना जंक्शन का प्लेटफार्म नंबर एक। सुबह का समय। स्टेशन पर स्वागत करने वालों की भारी भीड़ जुटी है। एनवाईपी पटना के सुनील सेवक अपने साथियों के संग।
सुलभ इंटरनेशनल के निदेशक डाक्टर बिंदेश्वर पाठक अपने लाव लश्कर के साथ। बरौनी से चलकर सदभावना स्पेशल प्लेटफार्म नंबर एक पर पहुंची। अभूतपूर्व स्वागत। अविस्मरणीय नजारा। सुब्बराव जी को तो हमने फूलों से लाद दिया। रेलवे स्टेशन पर यात्रियों को सुबह का नस्ता दिया गया। उसके बाद दिन भर का व्यस्त कार्यक्रम। ट्रेन का पटना में तीन दिनों का ठहराव है। हर राजधानी में अमूमन तीन दिनों का ही ठहराव है। रेलगाड़ी के कावेरी कोच यानी दफ्तर के कोच में एक अस्थायी फोन भी लगा दिया गया है। दिन भर के कार्यक्रम के बाद शाम के सर्वधर्म प्रार्थना सभा का आयोजन ऐतिहासिक गांधी मैदान के दक्षिण में स्थित सुलभ इंटरनेशनल के मुख्यालय में है।


पटना की सड़को पर साइकिल चलाते एसएन सुब्बराव जी, साथ में रेखा मुड़के। ( सौ सुनील सेवक)


पटना ज्वाएनिंग और रिलिविंग स्टेशन भी है। यहां पर मुजफ्फरपुर से रत्नप्रिया, शची स्मिता जैसे लोगों ने रेल यात्री के तौर पर यात्रा शुरू की है। सुलभ इंटरनेशनल में सभी रेल यात्रियों का भव्य स्वागत फूल मालाओं से किया गया। सभी यात्री इन फूलों से खेलने लगे। ये देखकर डाक्टर बिंदेश्वर पाठक बड़े खुश हुए। उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा- सुब्बराव जी हमारे प्रेरणा स्रोत हैं। 1969 में गांधी जी की जन्मशताब्दी वर्ष पर चली गांधी प्रदर्शनी रेल को हमने हाजीपुर में देखा था। वहीं सुब्बराव जी को पहली बार देखा और सुना था। इनसे मुझे समाजसेवा के क्षेत्र में आने की प्रेरणा मिली। हमारे लिए ये जानकारी नई थी। रात का खाना भी सुलभ की ओर से ही था। खाना का मीनू अत्यंत शानदार था। चंडीगढ़ के सुखना लेकर डिनर की याद आ गई।
डॉक्टर पाठक ने रेल यात्रियों को सुलभ के आंदोलन और तकनीक के बारे में बताया। उन्होंने कहा कोई भी चाहे तो अपने इलाके में सुलभ तकनीक के शौचालय बनवा सकता है। इस पर कोई कॉपीराइट नहीं है। सुब्बराव जी ने भी यहां पर शुचिता के महत्व पर बोला। उन्होंने स्विटजरलैंड की स्वच्छता का उदाहरण दिया जहां आप सड़क पर चलते हुए थूक भी नहीं सकते। शहरी क्षेत्रों में सार्वजनिक स्थलों पर लोगों की सुविधा के लिए शौचालय बनवाने में सुलभ का योगदान अतुलनीय है।



गुडविल ऑन ह्वील्स-  सदभावना यात्रा के पहले चरण के समापन के समय सुलभ इंटरनेशनल की ओर से सदभावना यात्रा पर खूबसूरत बहुरंगी स्मारिका (GOODWILL ON WHEELS)  प्रकाशित कराकर बांटी गई। इस स्मारिका में आफिस इंचार्ज के तौर पर मेरा नाम प्रकाशित है। पुस्तक का संपादन डॉक्टर लिसी भरुचा मैडम ने किया था।
तीन दिसंबर की ये रात मेरी सदभावना रेल यात्रा के पहले चरण में मेरा ये आखिरी दिन था।  रात के रेलवे स्टेशन आने के बाद मैंने वाराणसी के लिए रेल पकड़ ली। मेरी एमए प्रथम वर्ष की कक्षाएं शुरू हो चुकी थीं। इसलिए अब समाजसेवा और भ्रमण के नाम पर और वक्त निकालना मुश्किल था। यद्यपि सुब्बरावजी बार बार कहते थे कि साल भर रेल में रहने से अच्छी पढ़ाई क्या हो सकती है। आप सारा देश भ्रमण कर लोगे। पर मैं एक साल पढ़ाई ड्राप करने के लिए तैयार नहीं था। हालांकि आगे की रेल यात्रा में मेरे फूफेरे भाई अरविंद कुमार मेहता, मेरी छोटी बहन ऋतंभरा प्रकाश और हाजीपुर इकाई से कई नए साथी 20-20 दिनों के लिए सदभावना रेल यात्रा का हिस्सा  बने। 



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