Sunday, August 17, 2014

हमें हमारा खोया हुआ घर वापस मिल जाए... ((32))

जम्मू के रघुनाथ मंदिर में दिन का भोजन।
(पहियों पर जिंदगी 32)
जम्मू के शिविरों में रहने वाले कश्मीर के हिंदू शरणार्थी परिवारों को अगर भारत सरकार से कोई उम्मीद नहीं दिखाई देती तो वे राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ जैसे हिंदू संगठनों से भी निराश हैं। हालांकि वे अब भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि सब कुछ शांति से निपटा लिया जाए और घाटी में हमारा खोया हुआ घर में हमें वापस मिल जाए। इस सवाल पर कि क्या पाकिस्तान के साथ एक और जंग हो जानी चाहिए। सीमा पर रह रहे परिवार युद्ध के किसी भी आहट से कांप उठते हैं, उनका साफ मानना है कि ऐसी कोई जंग नहीं चाहिए। एक जिंदगी ही बहुत मुश्किल से मिलती है क्यों न इसे प्यार मुहब्बत से जीने में लगाएं।
मिश्रीवाला से शाम को हमारी साइकिल रैली वापस लौटते हुए देयारेन गांव में रुकी। इस गांव के श्री बलवान सिंह और उनके साथी युवा गतिविधियों में सक्रिय हैं। गांव में थोड़ा वक्त बीताने के बाद हमलोग  जम्मू रेलवे स्टेशन लौट आए। शाम की प्रार्थना सभा जम्मू रेलवे स्टेशन के बाहर हुई। आज जम्मू के आल इंडिया रेडियो पर सुब्बराव जी का साक्षात्कार भी प्रसारित हुआ। सर्वधर्म प्रार्थना सभा में जम्मू विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर वाईआर मल्होत्रा भी आए। उन्होंने इस मौके पर कहा- इन्सान इकट्ठा तो रहना चाहता है पर वह इकट्टा होकर भी अलहदा रहना चाहता है। सूचना तंत्र की कमजोरी पर उन्होंने खास तौर पर ध्यान दिलाया। लोगों में एकता बढ़ाने के लिए उन्होंने सूचना तंत्र को मजबूत बनाने पर जोर दिया।
जम्मू की शाम रेलवे स्टेशन के बाहर सांस्कृतिक कार्यक्रम में जर्मन बहनें सेंड्रा और मारेन ने आज अपना जर्मन नृत्य पेश किय़ा। उनका कार्यक्रम काफी सराहा गया। अमन जोत ने पंजाबी लोकधुन पर नृत्य पेश किया जिसे लोगों ने काफी पसंद किया।


जम्मू की सड़कों पर साइकिल चलाता हुआ मैं। 

हमारा रात का खाना जम्मू विश्वविद्यालय के मेस से आया। यहां से राष्ट्रीय सेवा योजना ( एनएसएस) के कोआर्डिनेटर डाक्टर वीके कपूर से लंबी वार्ता हुई।
अनुशासन तोड़ने पर भेजना पड़ा घर - 
जम्मू में दो दिनों के प्रवास के दौरान ये तय हुआ था कि सभी रेल यात्री अपने तय कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। यात्रियों को प्रसिद्ध तीर्थ वैष्णो देवी जाने के लिए समय नहीं दिया गया। क्योंकि तीर्थ यात्रा हमारा उद्देश्य नहीं था। पर झांसी के दो रेलयात्री चुपचाप वैष्णो देवी चले गए। मेरे जासूसी तंत्र ने इसकी जानकारी दी। मैंने सूचना रणसिंह भाई तक पहुंचा दी। अनुशासन भंग करने का मामला था। अगले सुबह के राइजिंग कॉल के बाद दोनों रेलयात्रियों की पेशी हुई। रणसिंह जी ने दोनों से पूछा कल कहां गए थे..उन्होंने जवाब दिया माता जी के दर्शन करने। अब आदेश हुआ अपना बैग पैक किजिए और अभी घर वापस चले जाएं। वे लोग अमृतसर में ही ट्रेन पर आए थे। खैर वे घर रवाना कर दिए गए।

ट्रेन में दिल्ली से ही एक महिला नर्स यात्रा में शामिल हुई थीं। एक बुजुर्ग स्काउट प्रशिक्षण शामिल हुए थे। हमने इन्हें इस बिनाह पर जगह दी थी कि ये हमारे सहयोगी साबित होंगे। खासतौर पर फर्स्ट एड में मददगार होंगे, पर ये दोनों सह यात्रियों के लिए परेशानी का सबब बन गए थे। अनुशासन से बाहर जाने के कारण हमें इन्हें भी बीच रास्ते से यात्रा से वापस घर भेजना पड़ा। एक सहयात्री बीमार हो गया
, वह भी वापस घर लौट गया। वैसे सुब्बराव जी रेलयात्रियों को आत्मशक्ति मजबूत करने की प्रेरणा देते हैं जिससे हम बीमार न पड़े। ये प्रेरणा बहुत काम आती है।




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