Sunday, October 26, 2014

खुले आसमान के नीचे कई दिन से बारी का इंतजार

( जन्न्त में जल प्रलय - 41)

राजभवन के हेलीपैड के अंदर और बाहर खुले आसमान के नीचे हजारों लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं, कब उनका नंबर आएगा और उन्हें वायुसेना का हेलीकॉप्टर उठाकर सुरक्षित स्थान तक पहुंचा देगा। 7 सितंबर की सुबह झेलम दरिया ने जो तांडव दिखाया उसके बाद 80 फीसदी श्रीनगर शहर तबाह हो चुका है। धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले इस शहर के तमाम सड़कों पर अभी भी 8 से 15 फीट तक पानी भरा है। शहर का राजबाग, लाल चौक, इंदिरा नगर, बंटवारा जैसे इलाके आठ दिनों से पानी  में डूबे हुए हैं। शहर से श्रीनगर एयरपोर्ट जाने के लिए तीन रास्ते हैं पर तीनों में पानी भरा हुआ है।
श्रीनगर एयरपोर्ट से नियमित उड़ानें जारी हैं पर एयरपोर्ट पहुंचे तो कैसे... वहीं जम्मू-श्रीनगर हाईवे खुलने में अभी कई दिन लगेंगे। 25 हजार से ज्यादा विदेशी नागरिक, पर्यटक, बाहर से आकर श्रीनगर में नौकरी करने वाले, दूसरे राज्यों के मजदूर अभी भी आपदा में फंसे हुए बाहर निकलने के लिए दिन भर उम्मीद भरी निगाहों से अपनी बारी का इंतजार करते हैं पर शाम ढल जाती है और उनका नंबर नहीं आता।  

रामपुर के मोहम्मद मसूद का नंबर तीन दिनों के बाद आया। सैकड़ो लोग चार दिन पांच दिन से अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं पर उनका नंबर नहीं आ रहा। जिन लोगों का नंबर आ गया मानो उन्हें नई जिंदगी मिल गई। जिनकी बारी नहीं आ रही है उनके मन में जिंदगी को लेकर निराशा बढ़ रही है। पता नहीं घर पहुंच भी पाएंगे या नहीं।

फंसे हुए लोगों को निकालने के लिए राजभवन के नेहरु हैलीपैड से उड़ान भरने वाले वायु सेना के हेलीकाप्टर रोज 500 से 1500 लोगों को ही बचाकर एयरपोर्ट पहुंचा पा रहे हैं। शुरुआती तीन दिन कुप्रबंधन के कारण कम लोगों की लिफ्टिंग हो सकी। सभी लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए हेलीकाप्टर के फेरे बढ़ाने जरूरी हैं।

राजभवन के बाहर हजारों लोग खुले आसमान के नीचे श्रीनगर की सर्द रातें गुजारने को मजबूर हैं। पीड़ित लोगों के लिए जो राजभवन के आसपास अपनी बारी का इंतजार करने वालों के लिए खाने-पीने की सामग्री आ रही है वह नाकाफी है। बच्चे भूख से बिलबिला रहे हैं। लोग तेजी से बीमार पड़ रहे हैं। पीने के पानी की कमी है। सीमा सुरक्षा बल ने कई जगह रैन बसेरों का इंतजाम जरूर किया है, पर ये रैन बसेरे बेघर हुए लोगों के लिए कम पड़ रहे  हैं। वहीं जम्मू कश्मीर सरकार की ओर से कहीं राहत शिविर चलता हुआ दिखाई नहीं देता।

( 13 सितंबर 2014 की रिपोर्ट, हिन्दुस्तान नई दिल्ली में प्रकाशित ) 



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