Saturday, September 13, 2014

चलें कश्मीर...गर फिरदौश जमीं अश्त... (( कश्मीर- 01))

( जन्नत में जल प्रलय -1)
उत्तर से लेकर दक्षिण तक पूरब से लेकर पश्चिम तक देश का कोना कोना घूम लेने के बाद मेरे आठ साल के बेटे अनादि की तमन्ना थी कि पापा हमें कभी श्रीनगर चलना है। अनादि फरमाते थे – वहां चलकर गुश्तवा खाना है, कहवा पीनी है और डल झील में शिकारे में सैर करनी है। जब मैं अगली छुट्टियों की योजना बना रहा था तो अनादि और माधवी से बिना सलाह लिए मैंने श्रीनगर की योजना बना डाली, क्योंकि मैं उन्हें ये पैकेज सरप्राइज देना चाहता था। दो दिन पहले जब मैंने अनादि को बताया कि हम श्रीनगर जा रहे हैं तो अनादि की खुशी देखने लायक थी। उसकी बड़ी तमन्ना पूरी होने जा रही थी। मैं भी कई बार माता वैष्णो देवी के दर्शन करने जा चुका था पर 1993 से 2003 के दौर में श्रीनगर का माहौल बेहतर नहीं होने के कारण पंजाब में रहते हुए भी श्रीनगर जाने की योजना नहीं बना पाया था। पर दिल इच्छा मेरी भी थी एक दिन उस शहर के लिए जाना है जिसके बारे में मुगल सुल्तान जहांगीर ने कहा था –गर फिरदौस जमीं अश्त, हमीं अश्त, हमीं अश्त... ( अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है...यहीं है) 

तो वह दिन आ गया जब 6 सितंबर 2014 को हमने पहली बार एयरपोर्ट मेट्रो सेवा का इस्तेमाल किया। नई दिल्ली से स्टेशन पर बना एयरपोर्ट मेट्रो स्टेशन भव्य है। लिफ्ट, गाइडेड कुली, पूरी तरह से बंद प्लेटफार्म, मेट्रो ट्रेन आने पर दरवाजे के अलावा बाकी हिस्से पूरी तरह से बंद हैं। यानी पटरी पर गिर कर हादसे होने की संभावना बिल्कुल नहीं। एयरपोर्ट मेट्रो की सीटें किसी फ्लाइट की तरह लगती हैं। लगेज रखने के लिए पर्याप्त जगह है। अगर आपको डोमेस्टिक टर्मिनल जाना है तो एयरोसिटी मेट्रो स्टेशन उतरना होगा। नई दिल्ली से एयरोसिटी का किराया 80 रुपये है आजकल। एयरोसिटी से बाहर निकलने पर मेट्रो की चाटर्ड बसें मिलती हैं जो 30 रुपये में चार किलोमीटर का सफर तय कराकर आपको एक डी- यानी डोमेस्टिक डिपारचर टर्मिनल पहुंचाती हैं।
नई दिल्ली एयरपोर्ट पर  प्रसिद्ध कवि श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी के साथ। ( खतरे से पहले) 


एयरपोर्ट मेट्रो में हमारी आगे वाली सीट पर एक सज्जन बैठे मिले जिनका चेहरा जाना पहचाना लग रहा था। मैंने पूछ डाला आप बुद्धिनाथ मिश्र तो नहीं हैं...मेरा अंदाजा सही निकला। बुद्धिनाथ जी से मेरी कभी मुलाकात नहीं हुई थी पर वे मेरे फेसबुक फ्रेंडलिस्ट में हैं। एक बार फिर जाल फेंक रे मछेरे.... कविता से प्रसिद्ध हुए कवि बुद्धिनाथ जी ओएनजीसी से रिटायरमेंट के बाद देहरादून में रहते हैं। वे देहरादून की फ्लाइट पकड़ने वाले थे। एयरपोर्ट पहुंचने तक घंटो उनका साथ रहा।

बातों-बातों उन्होंने बताया कि वे बनारस आज में काम कर चुके हैं। इस दौरान उन्होंने राम मोहन पाठक जी और शशि शेखर ( हिन्दुस्तान के समूह संपादक) के साथ भी काम किया है। बुद्धिनाथ जी से बहुत सारी ज्ञान की बातें सुनने के साथ चेकइऩ और फ्लाइट के इंतजार का वक्त कट गया। मेरे बेटे अनादि को उन्होंने अपने बैग से निकालकर एक सेब देते हुए कहा- तुम तो सेब के देश में जा रहे हो फिर भी मेरी ओर से ये सेब रख लो। तब हमें ये अंदेशा नहीं था कि हम किसी गंभीर संकट में फंसने वाले हैं जहां ये सेब भी बहुत काम आएगा।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KASHMIR, SRINAGAR, FLOOD ) 
आगे 62 कड़ियों में पढ़िए कश्मीर के श्रीनगर में 2014 के सितंबर में आए बाढ़ और उसमें फंसने और निकलने की कहानी.... 

1 comment:

  1. यह तो मानना पड़ेग विद्युत भाई, किस्‍सागोई का हुनर आपमें है। रोचक है... आहिस्‍ता-आहिस्‍ता पढ़ूंगा..

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