Saturday, August 30, 2014

यूपी के मैनेजेस्टर कानपुर में ((45))

( पहियों पर जिंदगी 45 )

06 नवंबर 1993  अगर लुधियाना पंजाब का मैनेजेस्टर है तो कानपुर उत्तर प्रदेश का। हमारी ट्रेन सुबह सुबह यूपी के सबसे बड़े औद्योगिक शहर कानपुर में खड़ी  है। शाहजहांपुर से ट्रेन रात में चली और बालामउ और उन्नाव होते हुए कानपुर पहुंची। वैसे शाहजहांपुर का मुख्य रेल मार्ग कानपुर नहीं लखनऊ जाता है।
हमारी ट्रेन समय से थोड़ी देरी से सुबह 7.30 बजे कानपुर जंक्शन पर पहुंची। कानपुर में हमारे नेटवर्क के लोग काफी पहले से ही रेलवे स्टेशन पर रेल यात्रा का इंतजार कर रहे थे। ऐसे हालात में रेल यात्रा अपने अपने डिब्बों में ही नित्यक्रिया से निवृत होकर तैयार रहते हैं। वैसे ये एक आदर्श समय है ट्रेन के पहुंचने का किसी रेलवे स्टेशन पर। यहां पर सुब्बराव जी का स्वागत गांधीवादी तरीके से हुआ। सर्वोदय के कार्यकर्ता सूत की बनी हुई माला लेकर आए उनका स्वागत करने।
कानपुर में हमारी मुलाकात यूथ होस्टल और एनवाईपी नेटवर्क के कुछ पुराने साथियों से हुई। उत्तर काशी शिविर में हमारे साथ रहे कीर्ति और समीर भी यहां मिले। वे देखते ही दौड़कर गले लगे। सदभावना यात्रा के दौरान अगर पुराने शिविरार्थी मिल जाते हैं तो उनका उत्साह देखने लायक होता है। हमने साथ मिलकर पुराने दिनों को खूब याद किया। 

 नास्ते के बाद रेलवे स्टेशन से हमारी रैली शहर के हरबंश मोहाल, कैंटोनमेट एरिया, कुछ मुस्लिम बस्तियों से होती हुई कृष्णा नगर पहुंची। यहां जानकी देवी बालिका उच्च विद्यालय में स्वागत और दोपहर का कार्यक्रम हुआ। हमारी साइकिल रैली का पथ 15 किलोमीटर का हो गया है। दोपहर के कार्यक्रम के बाद मैं और दिलीप दफ्तर के काम के वजह से रेलगाड़ी पर वापस आ गए।

देखो देखो हमारे दो सौ साइकिल समर्थक आ रहे हैं...
उधर, उत्तर प्रदेश में चुनाव का रंग चढ़ चुका है। अगले 18 और 21 नवंबर को विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाने हैं। इसलिए चुनाव प्रचार चरम पर है। हमारी सदभावना रैली कानपुर की सड़कों पर जा रही थी। पास में कहीं समाजवादी पार्टी की चुनावी सभा हो रही थी। मंच पर भाषण दे रहे एक नेता ने सदभावना साइकिल यात्रियों को देखते ही कहा कि देखो हमारे दो सौ साइकिल समर्थक आ रहे हैं। वास्तव में समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह साइकिल है। इसका उन्होंने थोड़ा सा लाभ ले लिया। 
कानपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन का मुख्य द्वार ( कैंट साइड ) 
हालांकि सुब्बराव जी अगले दिन इससे नाराज हुए पर वे कर क्या सकते हैं। हमारे सदभावना यात्रा की सारी साइकिलें एवन कंपनी की हैं। इन्हें दिल्ली के पास उनके साहिबाबाद प्लांट से खरीदा गया था। आर्डर देकर सभी साइकिलें नीले रंग की बनवाई गई थीं। कई जगह लोग इसे एवन की साइकिल रैली कह देते हैं। तब हमने एक दिन साइकिलों में जहां जहां एवन लिखा है वहां सदभावना के स्टिकर लगा दिए। पर हर साइकिल पर कंपनी का लोगो तो रहता ही है।

उदासी का सबब क्या है... कई लोगों ने मुझसे कहा कि विद्युत भैया आज आप बहुत उदास लग रहे हो। शायद ये सच भी हो, क्योंकि आज ही मैंने वैशाली एक्सप्रेस में अपना हाजीपुर वापसी का आरक्षण कराया है। हमारी छुट्टियां खत्म हो रही हैं। इसके साथ ही हमें 27 नवंबर को हाजीपुर में यानी अपने शहर इसी रेल यात्रा के स्वागत की तैयारी भी करनी है। शाम की रैली और सांस्कृतिक कार्यक्रम में मैं नहीं जा सका। पिछले कुछ दिनों से मुझे हल्का बुखार आ जा रहा है। मनोरमा दीदी मजाक में कह रही हैं- बीमारों के ज्यादा संपर्क में रहोगे तो बीमार पड़ोगे ही न...पिछले चार दिनों से ट्रेन में कई सद्भावना यात्रियों की सेहत हल्की फुल्की खराब हो रही है।
- vidyutp@gmail.com




No comments:

Post a Comment