Saturday, August 16, 2014

कश्मीरी शरणार्थी परिवारों का दर्द ((31))

जम्मूू के मिश्रीवाला गांव में एक शरणार्थी परिवार में। 
(पहियों पर जिंदगी 31)
24 अक्तूबर 1993 - मिश्रीवाला गांव में दोपहर में खाने के बाद सारे शिविरार्थी आराम करने लगे पर हम कश्मीरी पंडितों के परिवारों से मिलना चाहते थे। हमारे दोपहर के कार्यक्रम में शरणार्थी परिवारों के लोग और उनके बच्चे भी हिस्सा ले रहे थे। हमलोगों ने उनके सारे बच्चों को इकट्टा करके सामूहिक खेल शुरू कर दिया। देश भर से आए युवाओं की टोली और कश्मीरी शरणार्थियों के बच्चे कुछ मिनटों में ही हिलमिल गए। दूध और पानी की तरह। खेल में सारा हिंदुस्तान शामिल था। ये थी सद्भावना। कितने भाई कितने...आप चाहें जितने....ऐसे कैसे....मछली और जाल जैसे खेल हमने बच्चों के साथ खेले। खूब मजा आया। सभी बच्चे काफी खुश थे। उनका कहना था तीन सालों में शिविर में इस तरह का आनंद पहली बार आया है।
मैं और गुरप्रीत दोपहर के भोजन के बाद एक कश्मीरी पंडित के परिवार में गए। उनके गृह स्वामी का नाम श्याम लाल जी है। इनके दो बेटे और दो बेटियां हैं। बड़े बेटे की बहू और बच्चे भी हैं। ये लोग तीन साल पहले घाटी छोड़कर इस शिविर में आए हैं। सबसे पहले उनका दर्द था कि जो लोग कश्मीर घाटी की सर्द हवाओं का साथ छोड़कर यहां जम्मू की गर्मी में रहने को मजबूर हैं। यहां की जलवायु उन्हें रास नहीं आ रही है। अक्सर इस आबोहवा में उनकी सेहत खराब रहती है। मिश्रीवाला गांव में करीब 300 शरणार्थी परिवार रहते हैं। इनमें से कुछ को सरकार ने पक्के घर भी बनाकर दिए हैं। कुछ लोग स्वयं निर्मित झोपड़ियों में रहते हैं।

शरणार्थी शिविर का जीवन यानी बिल्कुल अलग दुनिया...सारा जीवन कैंपों में...आखिर ऐसा कब तक चलेगा...इसकी परिणति क्या होगी। अपने ही देश में अपने ही राज्य में निर्वासित जीवन जीने को मजबूर हैं ये लोग। यहां रह रहे परिवारों का दर्द और भी है। शरणार्थी परिवारों के बच्चों को समान्य स्कूलों में दाखिला नहीं मिलता है। वे अलग से खुले कान्वेंट या प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं। तीन साल से ज्यादा समय से रहने के बाद भी उनका नाम मतदाता सूची में नहीं दर्ज हुआ है। पीएल भट्ट जो श्याम लाल जी के बेटे हैं बीए प्रथम वर्ष में पढ़ते हैं। वे बताते हैं कि यहां कालेजों में समान्य छात्रों की तरह हमारे नामांकन नहीं हो सकते। हमारे लिए एमएन कालेज में अलग शिफ्ट में पढ़ाई होती है। पढ़ाई के क्रम में कक्षा में और परीक्षा में भी हमारे साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होता है। वे बताते हैं कि कश्मीर में हमारा फलता फूलता व्यापार था पर वहां के मुसलमानों द्वारा एक ही नारा लगता था- इंडियन डाग्स गो बैक... कश्मीर घाटी में मुसलमान आज अपने को हिंदुस्तान से जुडा हुआ नहीं पाते हैं। कश्मीर के शरणार्थी कहते हैं कि जे एंड के पुलिस का व्यवहार भी अच्छा नहीं है। बड़ी संख्या में खुफिया पुलिस विभाग में भी भरे हुए हैं।
आतंकवाद के समस्या के निदान के लिए हमारा मानना है कि श्री जगमोहन जी अगर थोड़े समय और कश्मीर के राज्यपाल होते तो समस्या का हल निकल आ सकता था। वे कहते हैं कि केपीएस गिल को कश्मीर का पुलिस महानिदेशक बनाकर भेजना चाहिए। साथ ही उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों की पुलिस को सीमा पर तैनात करना चाहिए। वे कहते हैं कि हमारे लिए भारत सरकार ने कुछ नहीं किया।


भारत सरकार के कश्मीर घाटी में शांति को लेकर उठाए गए कदमों से वे बिल्कुल सहमत नहीं दिखे। कुछ घंटे कश्मीरी पंडितों के शरणार्थी शिविर में उनका दर्द साझा करने के बाद हम आगे बढ़ चले। कहते हैं कि दिल जब दर्द से भरा हो तो उसे कुछ लोगों के साथ साझा करने से मन का बोझ हल्का होता है। शायद उनका भी कुछ बोझ हल्का हुआ होगा। लेकिन बार बार मन में ये सवाल उठता है कि अपने ही राज्य में रीफ्यूजी...आखिर ऐसा जीवन कब तक चलेगा। 





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