Sunday, August 31, 2014

गुजरे हैं जिन राहों पर साथ साथ... ((46))

कानपुर का प्रसिद्ध जेके मंदिर। 
( पहियों पर जिंदगी 46)
07 नवंबर 1993  सुबह की साइकिल रैली में मैं नहीं जा सका। कावेरी कोच में चल रहे सदभावना रेल यात्रा के मोबाइल दफ्तर का चार्च मैं आज भवानी भाई और रामकृष्ण भाई को सौंप रहा हूं। कानपुर रेल यात्रियों का ज्वाएनिंग और रिलीविंग स्टेशन भी है। पर आज यहां हमारे शहर हाजीपुर से कोई नया यात्री नहीं आया। सुबह 10 बजे मैं कृष्णकांत के साथ बिरहाना रोड गया। वहां एनवाईपी की शिविरार्थी और पुरानी सर्वोदय कार्यकर्ता सावित्री श्रीवास्तव रहती हैं, जो हमें बेंगलुरू शिविर में मिली थीं उनसे घर पहुंचा। उनके घर नास्ता किया। सावित्रि जी के साथ शिप्रा श्रीवास्तव भी बेंगलुरू में गई थीं, पर शिप्रा वहां नहीं मिली। वह किसी रिश्तेदार के यहां रहकर पढ़ाई कर रही है। कानपुर में रेलयात्रा का अनुशासन थोड़ा ढीला हुआ नजर आया। रणसिंह परमार भाई साहब ग्वालियर चले गए हैं। वे अभी लौट कर नहीं आए हैं।

आज सुबह का नास्ता कानपुर के जिलाधिकारी के निवास पर था। तो दोपहर का कार्यक्रम कानपुर के प्रसिद्ध उद्योगपति सिंघानिया परिवार के स्कूल में था। रेमंड और पार्क एवेन्यू उनके विश्व प्रसिद्ध ब्रांड है। सिंघानिया परिवार की ओर से बनवाया गया, कानपुर का जेके मंदिर काफी प्रसिद्ध है। रेल यात्रियों को इस मंदिर के दर्शन का मौका मिला। शाम का कार्यक्रम खलासी लाइन में था। रात को रेलवे स्टेशन के द्वतीय श्रेणी प्रतीक्षालय में ही सर्वधर्म प्रार्थना सभा और सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। रात को सोने में सबको देर हो गई।

हमारी हाजीपुर जाने वाली ट्रेन देर रात गए कानपुर से ही देर रात गए मिलने वाली थी। इसलिए मैंने सोने से पूर्व भाईजी से और दफ्तर के अन्य प्रमुख लोगों से विदाई ले ली। सुब्बराव जी कितने भी प्रिय लोग आएं या फिर जाएं दुखी नहीं होते। उनके अंदर गीता में कहे गए स्थित प्रज्ञ मनुष्य जैसे लक्षण है। वे किसी के जाने पर उदास नहीं होते। चेहरे पर एक जैसा भाव रहता है।



इससे अच्छी पढ़ाई क्या हो सकती है...
मुझसे सुब्बराव जी कहते रहे हैं कि रेलगाड़ी पर एक साल गुजारो। भला इससे अच्छी पढ़ाई और क्या हो सकती है। पूरा देश घूमने का मौका मिल रहा है। पर मैं सुब्बराव जी से विदाई लेते हुए उदास हो गया। अंदर ही अंदर आंसू आ रहे हैं। इतनी प्यारी ट्रेन। ट्रेन में देश भर से आए लोगों का परिवार छूटता जा रहा है। जब मैं वापसी का टिकट बनवा रहा था तो भी विश्वास नहीं हो रहा था कि मैं सदभावना यात्रा से अलग हो रहा हूं। भाई जी ने चलते हुए कहा- तुम दोनों ही चले जाओगे तो आफिस कौन संभालेगा।

वह अन्नपूर्णा में आखिरी चाय - रात को कुछ साथियों ने अन्नपूर्णा कोच में हमारे लिए चाय बनाई। तकरीबन दस लोगों ने साथ साथ चाय पी और उदास हो गए। इस चाय पार्टी में रेखा मुड़के, मधु भाई, देवेंद्र पासवान, मनोज शर्मा, वीना बंसल, गुरप्रीत जैसे लोग मौजूद थे। मानो एक परिवार बिछड रहा है। कई लोग तो रो पड़े।
 रेलयात्रा का मुंबई में स्वागत। सुब्बराव के साथ हैं उषा मेहता। यादें रह जातीहैं...
रात के डेढ़ बजे हैं। सभी डिब्बों के यात्री सो रहे हैं। मधुभाई ने कावेरी कोच का दरवाजा खोला। मैं और भाई अपनी सदभावना ट्रेन छोड़कर प्लेटफार्म नंबर 5 पर आ गए। दिल्ली से आने वाली वैशाली एक्सप्रेस का इंतजार करने लगे। मेरी आंखों में दिल्ली से चलने के बाद हर रेलवे स्टेशन के नजारे घूम रहे हैं। हम दोनों भाई और उदास होते जा रहे हैं। एक दिन पहले रेलयात्रियों की हुई सभा में अंतिम भाषण में मैंने शायर की ये पंक्तियां दुहराई थीं -
शिकवों को उठा रखना, आंखों को बिछा रखना
आ जाए शायद कोई, ......दरवाजा खुला रखना 
परंतु कुछ न कुछ शिकवे शिकायत तो जिंदगी में हमेशा बने ही रहते हैं। पर क्या सारी जिंदगी सदभावना की रेल हो सकती है। नहीं हो सकती ना...पुराने लोग बिछुड़ते हैं नए लोग मिलते हैं। लेकिन पहले जैसी बात कहां होती है...

गुजरे हैं जिन राहों पर कभी, हम तुम साथ साथ
वो राहें रोक कर पूछेंगी, बता तेरे हमसफर कहां गए....



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