Sunday, September 21, 2014

खुशबू सी आ रही है जाफरान की...((09))

( जन्नत में जल प्रलय - 9 )
खुशबू सी आ रही है जाफरान की,
खिड़की फिर कोई खुली है उनके मकान की...

ज्यों लूट ले कहार कोई दुल्हन की पालकी
कुछ ऐसी ही हालत है अपने हिंदुस्तान की...

कश्मीर में बड़े पैमाने पर जाफरान की खेती होती है। जाफरान को हिंदी में केशर और अंग्रेजी में सेफ्रॉन कहते हैं। श्रीनगर से आगे पांपोर में जाफरान की बडे पैमाने पर खेती होती है और यहां का जाफरान सबसे बेहतरीन माना जाता है। जाफरान कई तरह की बीमारियों में कारगर है। बच्चों को दूध में जाफरान मिलाकर देने से बच्चे सेहतमंद रहते हैं। असली जाफरान काफी महंगा बिकता है। श्रीनगर के तमाम दुकानदार जाफरान बेचते हैं। इसका भाव यहां 225 से 250 रुपये प्रति ग्राम का है। दिल्ली आकर ये जाफरान और महंगा हो जाता है। एक ग्राम में काफी पत्तियां आ जाती हैं, जिनका इस्तेमाल आप कई दिनों तक कर सकते हैं।

खोनाखान रोड पर मुश्ताक भाई की दुकान है। कश्मीरी शाल सूट और हेंडीक्राफ्ट के वस्तुओं की। हालांकि पूरे श्रीनगर में हर इलाके में इस तरह की दुकाने हैं। जहां से श्रीनगर आने वाले सैलानी शापिंग करते हैं। रात के 9.30 बज चुके थे। मुश्ताक भाई की दुकान खुली थी। होटल में जाकर सोने से पहले हमारी इच्छा हुई कि क्यों  कुछ सूट देख लिए जाएं। इससे पहले हम मीना बाजार में कश्मीरी गर्म सूट की कीमत आजमा चुके थे। मुश्ताक भाई की दुकान में स्टाक अच्छा लगा और कीमतें भी वाजिब। माधवी को एक गर्म सूट पसंद आ गया। थोड़ी मोलजोल हुई हमने एक कश्मीरी गर्म सूट खरीद लिया। मुश्ताक भाई ने बताया कि उनका एक बेटा भी पत्रकारिता का कोर्स कर रहा है। हालांकि वे उसके भविष्य को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं थे। मैंने कहा कि बेटे को पूरा अनुभव लेने दें और आप आने वाले वक्त को लेकर निश्चिंत रहें। उनसे काफी अच्छी बातचीत हुई। उन्होंने अपना कार्ड दिया औऱ मेरा कार्ड लिया।

मुश्ताक भाई की दुकान पर हमने जाफरान देखा। उन्होंने जाफरान के बारे में बताया और असली जाफरान की पहचान बताई। हमने सोचा था कि श्रीनगर छोड़ने से पहले थोड़ा सा जाफरान खरीदते हुए चलेंगे। साथ ही मुश्ताक भाई की दुकान से कुछ हैंडीक्राफ्ट वाले बैग भी खरीदेंगे।
पर अगले दिन मुश्ताक भी की दुकान नहीं खुली। जिस सड़क पर उनकी दुकान थी वहां झेलम दरिया से आने वाले खतरे को लेकर शोर था। हम न दुबारा मुश्ताक भाई से मिल सके ऩ कुछ और खरीददारी कर सके। कई दिनों बाद दिल्ली से फोन मिलाया तो मुश्ताक भाई से बात हुई। उन्होंने बताया कि उंचाई पर होने के कारण उनकी दुकान तो नहीं डूबी है, पर अब न जाने कितने महीने बाद फिर से डल गेट सैलानियों से गुलजार होगा और कुछ बिक्री होगी। मुश्ताक भाई का घर भी ऊंचाई पर होने के कारण बच गया। वे उन चंद खुशकिस्मत लोगों में से हैं जिनका इस सैलाब में कुछ भी नुकसान नहीं हुआ। पर वादिए कश्मीर में हर किसी की किस्मत मुश्ताक भाई जैसी नहीं है।


-    विद्युत प्रकाश मौर्य   

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