Tuesday, September 9, 2014

बोध गया के समन्वय आश्रम में ((56))


(पहियों पर जिंदगी 55)
रेणुकूट से हमारी ट्रेन चलकर डाल्टेनगंज, सोन नगर, होती हुई बिहार के गया जंक्सन पहुंची। गया में दो दिनों का ठहराव है। यहां हमलोग साइकिलों से सबसे पहले बोध गया के महाबोधि मंदिर गए। गया से बोधगया की दूरी 11 किलोमीटर है।

गया में विनोबा भावे द्वारा स्थापित समन्वय आश्रम है। इस आश्रम के संचालक वयोवृद्ध द्वारको सुंदरानी जी से हमारा मिलना हुआ।
 द्वारको सुंदरानी जी को उनके महान कार्यों के लिए 1992 में 6 जून को जमनालाल बजाज पुरस्कार मिल चुका है। अस्सी साल से ज्यादा के उम्र में भी काफी सक्रिय रहे। प्रचार से दूर सुंदरानी जी गांधी जी के फलसफे मेरा जीवन ही मेरा संदेश है के तर्ज पर काम करते हैं। उन्होंने अपने जीवन के पांच दशक से ज्यादा का वक्त दलितों आदिवासियों के कल्याण के लिए लगा दिया। आश्रम में हर तरह के लोगों के प्रवेश की इजाजत है। अत्यंत गरीब लोग आश्रम में पहुंच कर प्रार्थना करते हैं।

DWARKO SUNDRANI  ( 1922 Born ) 
सुंदरानी जी जैसे महान सामाजिक कार्यकर्ता मौन रहकर क्रांति करने में आस्था रखते हैं। गया के आसपास के 250 से ज्यादा गांवों में आश्रम कार्य करता है। हर साल आई कैंप लगाता है जिसमें हजारों लोगों का मुफ्त इलाज होता है। आश्रम आदिवासी बच्चों के लिए स्कूल चलाता है।  सुंदरानी जी का जन्म सिंध के लरकाना में 6 जून 1922 को हुआ। लरकाना से उन्होंने हाईस्कूल की पढ़ाई की। 20 साल की आयु में वे गांधीवादी विचारों के प्रभाव में आए। इसके बाद जिंदगी बदल गई। लोगों के लिए जीने लगे। 1953 में वे विनोबा जी के कहने पर बोध गया आए। 18 अप्रैल 1954 को समन्वय आश्रम की स्थापना बोधगया में हुई। 

आश्रम में ही गया के सांसद और नगर के प्रमुख लोग रेल यात्रा के स्वागत में आए। गया में हमारे स्वागतकर्ता रवि जी हैं जो रणसिंह परमार जी के पुराने दोस्त हैं। रवि जी के बेटी अनुराधा पटना में पढ़ाई कर रही थी। उससे मेरी मुलाकात पहले फेज में रेलयात्रा के दौरान हुई थी। बाद में अनुराधा दिल्ली में मिली तब वह राजगोपाल जी के आवास में गांधी शांति प्रतिष्ठान में रहकर दिल्ली में पढ़ाई कर रही थी। बाद में उसका झुकाव फिल्मों की ओर हुआ और वह मुंबई चली गई। पता नहीं अनुराधा इन दिनों कहां है।

डीएन सहाय के फार्म हाउस में -  शाम को हमारी रैली फल्गु नदी को पार करके एक गांव में पहुंची। यहां डीएन सहाय जी का विशाल फार्म हाउस है। यहां पर हमारे लिए रात्रि भोजन का इंतजाम है। यहां रात्रि भोज में हमने देखा कि सहाय जी के फार्म हाउस के आसपास के रहने वाले अत्यंत गरीब परिवारों के लोग भी आकर हमारे साथ खाने पर बैठ गए। पता चला कि सहाय जी आसपास के सभी गरीब परिवारों की पूरी इज्जत करते हैं और अपने मेहमानों के साथ उन्हे बिठाकर खिलाते हैं। इस फार्म हाउस में शत्रुघ्न सिन्हा की फिल्म पतंगा की शूटिंग हो चुकी है।
वापस लौटते समय फल्गु नदी के पुल पर मेरी साइकिल की चेन उतर गई और मैं बाकी यात्रियों से पीछे रह गया। तभी एक स्थानीय कार वाले सज्जन चिल्लाए जल्दी भागो नहीं तो मार डाले जाओगे। अरे क्या गया में फल्गु नदी के पुल पर इतना डर है। नहीं तो....

हमारा अगला पड़ाव बक्सर - ऐतिहासिक जेल में पहुंची यात्रा



गया से हमारी ट्रेन रात को चल पड़ी। अगला पड़ाव बक्सर था। गया से बक्सर ट्रेन पटना होकर पहुंची पर इस बार पटना में पड़ाव नहीं था। बक्सर में हमारे स्वागतकर्ता महान स्वतंत्रता सेनानी जीतेंद्र द्विवेदी थे। उनकी अगुवाई में बक्सर रेलवे स्टेशन पर यात्रा की भाव भरा स्वागत हुआ। समाज के हर वर्ग के लोग यात्रा के स्वागत में रेलवे स्टेशन पर पहुंचे थे।  उनसे मेरी दिल्ली में गांधी शांति प्रतिष्ठा में पहले भी मुलाकात हो चुकी है। मैंने इतनी अधिक उम्र में इतना सक्रिय कोई स्वतंत्रता सेनानी नहीं देखा। वे बक्सर के पास के नदांव गांव के रहने वाले हैं। उनकी उम्र 70 के पार हो चुकी है। पर अक्सर अकेले यात्राएं करते हैं। वाणी में ओज है उम्र का कोई असर उनकी चाल ढाल में नहीं दिखाई देता।
बक्सर में उनके अगुवाई में स्वागत का इंतजाम शानदार था। शहर के हर वर्ग के लोग स्टेशन पर सुबह सुबह पहुंचे थे। रेल यात्रा को ऐतिहासिक बक्सर के सेंट्रल जेल भी ले जाया गया। इस जेल में कैदियों की फांसी के लिए रस्सी तैयार की जाती है। इस मामले में बक्सर जेल की ख्याति है। देश के कई हिस्सों में जब किसी को फांसी दी जाती है तो रस्सी बक्सर जेल से ही ले जाई जाती है। सदभावना यात्रियों के लिए जेल की यात्रा करना काफी सुखद अनुभव रहा।  
बक्सर के पास उनवास गांव में हमारे दोस्त राजेश रंजन सहाय का भी घर है जो महान साहित्यकार आचार्य शिवपूजन सहाय के परिवार से आते हैं। इसलिए मैं राजेश के घर जाने के सिलसिले में बक्सर कई बार आ चुका हूं। सदभावना रेल यात्रा के दूसरे चरण से मेरा जुड़ाव बस यहीं तक रहा। बक्सर से मैं अपने अध्ययन स्थली काशी हिंदू विश्वविद्यालय में वापस लौट आया।


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