Saturday, October 4, 2014

द लास्ट सपर ( आखिरी रात्रि भोज )

( जन्नत में जल प्रलय 19 )

पानी के बीच पानी की तलाश
08 सितंबर 2014 – दोपहर में खिचड़ी खाने के बाद सबके शरीर में थोड़ी ताकत आ गई थी। मिल्क पाउडर आ गया था इसलिए सबके लिए शाम की चाय का भी इंतजाम हो गया। हम चारों तरफ से पानी से घिरे थे। पीने के पानी का इंतजाम कहीं नहीं था। बिजली नहीं थी इसलिए मोटर चलाकर होटल की टंकियां नहीं भरी जा सकती थीं। हमारे होटल की पानी की टंकी खाली हो चुकी थी। लोग टायलेट जाने के लिए बाढ़ के पानी को बाल्टियों में भर कर इस्तेमाल कर रहे थे. पर इस पानी से इन्फेक्शन का खतरा था। पानी में बड़ी मात्रा में डीजल और पेट्रोल मिल कर आता हुआ दिखाई दे रहा था क्योंकि शहर के तमाम पेट्रोल पंप डूब गए थे और शायद कुछ पंपों की स्टोरेज टंकियां फूट गई थीं। इसलिए ये पानी हमें आतंकित कर रहा था।


हमें पास खाली हो चुके होटल की तीन स्टोरेज टंकियां आधार तल पर पानी में डूबी हुई दिखाई दीं। बनारस से आए उत्साही भाई कई महिलाओं की दुपट्टे और साड़ियों रस्सियां बनाकर नीचे उतरे। उन तीनों टंकियों में पानी भरा हुआ था। लोगों रस्सी से बाल्टियां नीचे उतारीं और इस तरह हमारे लिए खाना बनाने और पीने के पानी का इंतजाम हो सका। पर इस पानी का भी स्टाक सीमित था।

अंधेरा छा गया था घड़ी ने रात के आठ बजाए। अब रात के खाने की चिंता थी। एक बार फिर हमारी टीम में  मौजूद 250 लोगों में से कुछ रसोई के जानकार जुट गए रात का भोजन बनाने के लिए उपक्रम करने में। दोपहर में खिचड़ी बनी थी रात को चावल और दाल बनाने की कोशिश की गई। खाना तैयार हो गया।


सबके कमरे में चावल और दाल पहुंचाई गई। हमलोग आफताब भाई के कमरे में थे। इस बार खाने में चावल पूरी तरह पका नहीं था। अनादि और माधवी के लिए ये चावल निगलना मुश्किल हो रहा था। पर आपदा की इस घड़ी में कोई विकल्प नहीं था। हमने और वानी साहब ने इसका तरीका निकाला, कच्चे चावल को मुहं में देर तक चबा चबा कर किसी तरह खाने को उदरस्थ किया। हमें अंदेशा था कि कल को शायद हमें ये भी नसीब न हो। पर माधवी और अनादि आधे पेट खाकर ही रह गए। हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से आई दीपा शर्मा जो सरस मेले में अचार का स्टाल लगाती हैं। उनके पास मिर्च का अचार था। इस सादे चावल दाल के साथ उनका अचार हमारे लिए वरदान बनकर आया। अभी उस अचार की कीमत हमारे लिए हजारों में थी। श्रीनगर में आई आपदा की घड़ी मे कच्चा चावल और दाल हमारा लास्ट सपर था।

होटल वाले एजाज भाई को हमारे बेटे का खास ख्याल था। वे रात को हमारे कमरे में आए। एक अमूल होमोजोनाइज्ड मिल्क का टेट्रा पैक हमें पकड़ाते हुए कहा कि ये आपके बेटे के लिए कहीं से ढूंढ कर लाया हूं ताकि उसे  ताकत मिलती रहे। दो दिन में जब भी बाहर गए कभी चाकलेट वाले बिस्कुट और दूध ढूंढ कर वे मेरे बेटे के लिए लाते रहे। हम उनके इस एहसान बदला भला कैसे चुका पाएंगे।


-    विद्युत प्रकाश मौर्य ( THE LAST SUPPER, FLOOD, KASHMIR ) 

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