Thursday, September 18, 2014

अली भाई का शिकारा....((06))

( जन्नत में जल प्रलय - 6 )
खाने के बाद इच्छा हुई कि आधा दिन है थोड़ा सा घूम लिया जाए। हमलोग डल गेट नंबर एक के पास से झील की ओर उतरती पगडंडी पर आगे बढ़े। एक तरफ दुकानें थीं तो दूसरी तरफ डल झील में लगे हुए शिकारे और हाउस बोट। अनादि तो सालों से यही देखने की तमन्ना रखते थे। तभी एक बुजुर्ग हमारे पास आए। उन्होंने शिकारे में डल झील घूमने का प्रस्ताव दिया। अपना नाम अली भाई बताया उम्र होगी कोई 70 के पार। सैलानी कम हैं, मंदी का माहौल है। वे चाहते थे हम उनके शिकारे पर डल की सैर करें। 

अली भाई अपनी बातों में उलझा कर हमें अपना शिकारा दिखाने ले गए। घाट नंबर एक पर रहने वाले खूबसूरती से संवारे गए उनके शिकारे पर हैवन सेवन लिखा था। 1980 का रजिस्ट्रेशन नंबर। पर माधवी डल में शिकारे पर सैर को तैयार नहीं हुई। यशपाल भाई की पत्नी से मिली जानकारी से माधवी खौफ में थी। डल झील के पानी स्तर बढ़ रहा है। कोई खतरा हो सकता है। आसमान में बादल थे। फिर से बारिश आ गई तो क्या होगा। हालांकि हमारे पास छाता था। हमने अली भाई को कहा, कल सुबह आपके शिकारे पर घूमेंगे। 

थोड़ी देर और घूमने के बाद हमारा इरादा बना कि डल में आज ही सैर कर लिया जाए। हमने अली भाई को ढूंढना शुरू किया। एक दूसरे शिकारे वाले मिले बताया कि ग्राहक नहीं मिलने पर अली भाई निराश होकर अपने घर चले गए हैं। मैं उनका भाई हूं आप हमारे शिकारे पर घूम लो। हमलोग शिकारे पर सवार हो गए। दो लोग मिल कर चप्पू चला रहे थे। डल में शिकारे पर सैर करना एक शाही एहसास दिलाता है। सैर में आनंद तो आ रहा था पर हमें नहीं मालूम था कि कल यहां कितना बड़ा खतरा आने वाला है।

डल में हमारा शिकारा आगे बढ़ता जा रहा था। मामला 300 रुपये में तय हुआ था। मुझे लगता है उन्होंने शिकारे पर हमें कम से कम आठ किलोमीटर की सैर कराई। दो लोग चप्पू चला रहे थे। मेरे हिसाब से ये सस्ता सौदा था। शिकारे के आसपास अनगिनत हाउस बोट डल में दिखाई दिए। कुछ सजे संवरे तो कुछ वीरान। हाउस बोट पर डिश टीवी छतरियां लगी थीं।
बातों बातों में पता चला कि कई हाउस बोट कश्मीरी लोगों के स्थायी निवास बन गए हैं। इन हाउस बोट में आने के लिए परिवार के लोग छोटी नाव का इस्तेमाल करते हैं। हमें दो महिलाएं ऐसी ही एक छोटी नाव से अपने हाउस बोट की ओर जाती दिखाई दीं।

डल में घूमते हुए अली भाई ने बताया कि सामने ऊंचाई पर जो पहाड़ी दिखाई दे रही है वह शंकराचार्य मंदिर है। पहुंचने के लिए 250 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। इसी मंदिर में राजेश खन्ना का गीत – जय जय शिव शंकर ..कांटा लगे ना कंकर की शूटिंग हुई थी। अली भाई को ये भी मालूम है कि वो हीरो अब इस दुनिया में नहीं रहा।
हमें शिकारे में घूमते हुए फिल्म आरजू के राजेंद्र कुमार और मेहमूद याद आए जो  हाउस बोट में मस्ती किया करते थे। जब जब फूल खिले... के शशि कपूर याद आए, जो फिल्म में डल में शिकारा चलाते हैं और गाते हैं – बागों में जब जब फूल खिलेंगे...तब तब हम तुम हरजाई मिलेंगे। पर डल झील आज हमें बदरंग लग रही थी...

-    विद्युत प्रकाश मौर्य   

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