Wednesday, October 1, 2014

शंकराचार्य पर्वत और हरि पर्वत बने सहारा

( जन्नत में जल प्रलय 16 )
रविवार 8 सितंबर की दोपहर तक श्रीनगर शहर का 80 फीसदी इलाका डूब चुका था। घबराए हुए लोग सुरक्षित स्थानों की तलाश में थे। खोनाखान रोड पर लोग शोर मचाते हुए दौड़ लगा रहे थे। हमने कई वाहनों के के छत पर लोगों को नावें ले जाते देखा। जिन इलाकों में लोग दो से तीन मंजिल डूब गई थीं वहां के लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने के लिए नावों का इंतजाम किया जा रहा था। 
डल झील के साथ स्थित शंकराचार्य पर्वत। 
कई जगह सेना, एनडीआरएफ की टीम लोगों को सुरक्षित स्थान की ओर निकालने की कोशिश में लगी थी। शहर के ज्यादातर इलाकों की सड़कों पर पानी बह रहा था। ऐसे में हमारे डल गेट के पास कोनाखान रोड ज्यादा सुरक्षित थी जिसपर सात तारीख की रात 12 बजे से 8 की शाम 5 बजे तक पानी आया। बड़ी संख्या में लोगों ने इसी सड़क पर रात गुजारी। शहर के अलग अलग इलाकों से बचकर आए लोगों ने इस इलाके के ममता और ग्रैंड ममता होटल में शरण ली। ये दोनों इस इलाके के महंगे होटल में शुमार हैं। निचले इलाकों से बचकर आए सैलानी डल गेट इलाके के ऊंचाई पर स्थित होटलों में शरण मांगते देखे गए। कई बार होटल वालों ने कुछ लोगों को रख लिया। पर आने वाले खतरे को देखते हुए होटल वाले भी और नए लोगों को अपने यहां रखने को तैयार नहीं थे। पहली बात कि इन होटलों में खाने के लिए कुछ नहीं था। दूसरी बात होटलों की इमारतें खतरे में थीं। खुद होटल के मालिक और मैनेजर अपने लिए सुरक्षित स्थानों की तलाश में जुटे थे। 
  
श्रीनगर की सड़क पर कोहराम मचा था। हजारों सैलानी विदेशी नागरिक उधर उधर भाग रहे थे। इस प्रलय की घड़ी में कहां जाएं किसी की समझ में नहीं आ रहा था। संचार व्यवस्था ठप्प थी इसलिए किसी से कोई मदद तो मांगने का साधन ही नहीं था। काफी लोगों ने हसरत भरी निगाहों से शंकराचार्य मंदिर की पहाड़ी की ओर देखा। पूरे शहर में आए खतरे को भांपते हुए लोग जान बचाने के लिए हर रास्ते से शंकराचार्य पहाड़ी पर चढने लगे। इस बात की तसल्ली तो थी कि ये पहाड़ी नहीं डूबेगी। पर पहाड़ी पर खाने के लिए कुछ नहीं था। सोना तो दूर बैठने के लिए जगह नहीं थी। खुले आसमान में सर्द रात गुजारने के अलावा कोई चारा नहीं था। पर बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक, दूसरे शहरों से आए सैलानी इस पहाड़ी पर चढ़ते नजर आए। 
डल गेट से ढाई किलोमीटर आगे एक और पहाड़ी है हरि पर्वत। सालों भर श्रीनगर आने वालों के लिए यह भी एक दर्शनीय स्थल है। पर हरि पर्वत भी आपदा की घड़ी में संकट मोचक बना। बड़ी संख्या में लोगों ने इस पहाड़ी पर भी शरण ली। हरिपर्वत पर एक मंदिर और मखदूम साहब की मजार भी है। आम दिनों के लिए यहां जम्मू एंड कश्मीर टूरिज्म ने मखदूम साहिब तक जाने के लिए रोपवे का निर्माण कराया है। यहां एक मस्जिद भी है। पर्वत पर लोगों की मदद के लिए स्थानीय लोगों ने अपनी ओर से जो भी संभव था इंतजाम करने की कोशिश की थी। यहां पर कुछ खाद्य सामग्री भी उपलब्ध थी। हमारे साथ फंसे लोगों में भी कुछ लोगों का विचार हरि पर्वत पर जाकर शरण लेने का था। 

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

2 comments:

  1. कुदरत की ओर से आया यह प्रकोप वाकई भयावह था :(

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    1. हां शाहनवाज भाई मेरी पूरी सीरीज पढ़े विस्तार से लिख रहा हूं।

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