Friday, September 19, 2014

पानी में तैरते खेत और मीना बाजार ((07)

( जन्नत में जल प्रलय - 7 )
डल झील में सैर करते हुए हमें अली भाई ने जल में तैरते हुए खेत दिखाए। पानी में तैरता हुए एक मिट्टी का स्तर है जिसपर हरियाली लगी है। कई तरह की घास। इस तैरती हुई मिट्टी पर डल में खेती होती है। कई तरह की सब्जियां पानी में तैरती हुई मिट्टी पर उगा ली जाती है। डल के सीने पर खेती। ये हमारे लिए कौतूहल का विषय था। पर है ये सच। इंसान ने प्रकृति के दोहन के जितने तरीके हो सकते हैं,, निकाल लिए हैं। 

श्रीनगर शहर में आबादी का बोझ बढ़ा है तो काफी लोग स्थायी तौर पर डल झील में ही चलते फिरते घर में अपना आशियाना बना चुके हैं। झील में अस्थायी पोल गाड़कर बिजली भी बुला ली है। यानी झील में पूरी कालोनी बस गई है जनाब। इससे झील का स्वाभाविक विस्तार नजर नहीं आता। झील में हमारा शिकारा यूं आगे बढ़ रहा है मानो हम शहर की किसी गली से गुजर रहे हों।

अब किसी शहर की गली जैसी हो गई है झील तो गंदगी का आलम भी होगा। झील में रहने वाले लोग और हाउस बोट झील में खूब गंदगी फैलाते हैं। झील का पानी बिल्कुल गंदला हो चुका है। पानी बोतलें और घर से निकलने वाला टनों कचरा झील की सूरत को बदरंग बना रहा है। हमने भोपाल शहर की झीलें देखी हैं। 

हैदराबाद की हुसैन सागर लेक देखी है। मणिपुर के लोकटक लेक का भी नजारा किया है। पर डल झील के बारे में बचपन से सुनते आए थे, पर इस झील को देखकर भारी निराशा होती है। क्या इंसान इतना स्वार्थी हो सकता है। वह सिर्फ इन जलाशयों से लेना जानता है। उनकी रखरखाव की रत्ती मात्र भी चिंता नहीं है उसे। सुनने में आया कि हर साल डल झील की सफाई के नाम पर जम्मू एंड कश्मीर सरकार बजट जारी करती है। पर दिन में डल झील का कचरा निकाला जाता है, रात में उस कचरे को वापस उसी डल झील में फेंक दिया जाता है। इस तरह हो जाती है सफाई अभियान की इतीश्री।

झील में मीना बाजार 
हमारा शिकारा घूमते घूमते मीना बाजार पहुंच चुका है। डल के अंदर बड़े बड़े हाउस बोट पर बने हैं स्थायी बाजार। जिन्हें कहते हैं मीना बाजार। हम एक शो रुम में पहुंचे।यहां कश्मीर के बने शॉल, गर्म महिलाओं के लिए सलवार सूट, रेडिमेड कुर्ता जैसी तमाम चीजों का भारी स्टाक था। हमने दो हाउस बोट पर बाजारों पर काफी कपड़े देखे। पर माधवी को कोई खास पसंद नहीं आया। दरअसल जो भी शिकारे वाले अपने शिकार पर घूम रहे सैलानियों इन मीना बाजार में लेकर आते हैं उन्हें खरीददारी हो जाने पर बाद में अच्छा कमीशन मिलता है। 

बिल्कुल लखनऊ के चिकेनकारी वर्कशाप की तरह। इन मीना बाजार के दुकानदारों के पास क्रेडिट कार्ड से भुगतान, थोड़े पैसे देकर बाकी का भुगतान पार्सल से सामान भेजने के बाद करने का भी विकल्प मौजूद है। हमने कोई खरीददारी नहीं की। पर हमारे शिकारा चालक इससे दुखी नहीं हुए। रास्ते में सैर कराते हुए उन्होंने हमें घाट नंबर एक पर वापस छोड़ दिया। उतरते समय माधवी से पूछा मैडम आप बेकार डर रही थीं, कहीं झील में सैलाब आया क्या...हम डल की सैर कर चुके थे...पर हमें या अली भाई को शायद ये एहसास नहीं था कल सचमुच सैलाब आने वाला है और डल झील का नजारा बदल जाएगा...

-    विद्युत प्रकाश मौर्य   

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