Wednesday, September 17, 2014

अपना वैष्णो ढाबा की दाल रोटी... ((05 ))

( जन्नत में जल प्रलय - 5 )
दोपहर में अपने होटल के कमरे में सामान जमा लेने के बाद हमें भूख लगी थी। हमलोग खोना खान रोड पर पेट पूजा के लिए कोई होटल ढूंढने निकले। थोड़ी दूर चलने पर मुख्य सड़क पर अपना वैष्णो ढाबा का बोर्ड नजर आया। ढाबा सीढ़िया चढ़कर पहली मंजिल पर था। हमने मीनू कार्ड देखा। 120 रुपये की थाली। इस थाली में दाल, रोटी, चावल, सब्जियां आदि थीं। तेज भूख लगी थी इसलिए और तलाश का कोई विकल्प नहीं था। हमने यहीं पर दो थाली आर्डर दे दिया और खाने का इंतजार करने लगे। इस बीच होटल के मालिक यशपाल शर्मा से परिचय हुआ। वे श्रीनगर में रहने वाले चंद हिंदू परिवारों में से एक हैं। वैसे वे जम्मू क्षेत्र के हैं। उनकी ज्यादातर रिश्तेदारियां पंजाब में हैं।



ढाबे में उनकी पत्नी और दो साल का नन्हा बच्चा भी मौजूद था। पता चला कि वे ढाबे से नीचे कुछ दूरी पर किराए के मकान में रहते हैं। पर डल झील का स्तर बढ़ जाने के कारण उनके घर में पानी आ गया है। इसलिए वे पत्नी और बच्चे के साथ घर के जरूरी सामान को लेकर ढाबे में ही आ गए हैं। ढाबा पहली मंजिल पर है। इसलिए ये जगह महफूज है। थोड़ी देर बाद उनकी पत्नी बच्चों के संग आई। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं। कई साल से श्रीनगर में हैं। पर डल झील का पानी इस तरह बढ़ते नहीं देखा। हमारा घर डूब गया। कार को भी सुरक्षित जगह पर रखने के लिए यहां लाकर सड़क पर खड़ा किया है। उनकी चिंता थी...कब पानी कम होगा और हम वापस अपने घर में जाएंगे।

कहां से आएगा खाना...

बातों बातों में हमारा खाना खत्म हो चुका था। तवे की रोटी और दाल तो बिल्कुल हमारे घर के जैसी बनी थी। पंजाबी तड़का नहीं बल्कि हमारे यूपी और बिहार के जैसी। माधवी तो अपना वैष्णो ढाबा के खाने का स्वाद नहीं भूली। उसका कहना था जब तक श्रीनगर में हैं। यहीं पर जीमने आया करेंगे। पर अपना वैष्णो ढाबा में खाने का दूसरा मौका नहीं मिला। यशपाल शर्मा जी ने हमें शहर के बारे में कई जानकारियां दीं। बिल्कुल किसी अपने दोस्त या भाई की तरह। यशपाल भाई की पत्नी की चिंता थी कि होलसेल बाजार में पानी घुस गया है, सब्जियां नहीं मिलेंगी तो आगे ढाबा कैसे चलेगा। मैंने पहली बार उनके चेहरे पर आने वाले खतरे का डर देखा।

अगली सुबह माधवी होटल के कमरे में सो रही थी। मैं और अनादि सुबह उठकर टहलने निकले। मेरी आदत है जिस नए शहर में घूमने जाता हूं वहां की सुबह देखने की इच्छा होती है। सो मैं और अनादि 7 तारीख की सुबह एक बार फिर अपना वैष्णो ढाबा में थे। अनादि को कहवा पीनी थी। हम दोनों ने कश्मीरी कहवा का स्वाद लिया। इसमें कई जड़ी बुटियां डाली जाती हैं जो सेहत के लिए फायदेमंद है।

कहवा पीने के बाद यशपाल भाई को पैसे देने के लिए पर्स निकाला तो खुले पैसे नहीं थे। यशपाल भाई ने कहा, कोई बात नहीं जब भाभी जी के साथ नास्ता करने आएंगे तब पैसे दे दिजिएगा। लेकिन अपना वैष्णो ढाबा में दुबारा जाने का मौका नहीं मिला। दोपहर के बाद बाढ़ का खतरा और सड़कों पर शोर था। अपना वैष्णो ढाबा का शटर गिर चुका था। श्रीनगर छोड़ने तक हमारी यशपाल भाई से मुलाकात नहीं हो सकी। दिल्ली पहुंचने पर उनका फोन लगातार बंद मिलता रहा। न जाने किस हाल में होंगे यशपाल भाई और उनका परिवार।   

-    विद्युत प्रकाश मौर्य   
(APNA DHABA, SRINAGAR, DAL GATE , FLOOD ) 

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