Thursday, October 2, 2014

मस्जिद से आई अजान ने दी जीने की हिम्मत

( जन्नत में जल प्रलय 17 )
आठ तारीख की सुबह घड़ी ने पांच बजाए। मस्जिद से अजान की आवाज लाउडस्पीकर से सुनाई दी। मस्जिद प्रबंधन के पास जरूर बैटरी रही होगी या जेनरटेर का इंतजाम होगा जिससे लाउडस्पीकर चलाना मुमकिन था। अजान के बाद तकरीबन एक घंटे तक अल्लाह ताला से दुआओं का दौर जारी रहा। बाढ़ में फंसे लोगों के बचाने के लिए इबादत। मस्जिद से आती इस आवाज को सुनकर दिल को सूकुन मिल रहा था। हम अंदर से थोड़े मजबूत हो रहे थे आने वाले संकट का मुकाबला करने के लिए। सचमुच इबादत में ताकत होती है।

थोड़ी देर बाद उजाला हुआ। मेरा परिवार तीसरी मंजिल पर कमरा नंबर 10 में था। मैं सबसे पहले दूसरी मंजिल पर कोने वाले कमरे में मौजूद आफताब वानी के कमरे में गया। उनके साथ इस कमरे में बड़े भाई गुलाम रसूल वानी उनकी पत्नी और उनके दो बच्चे कामरान और हसन ठहरे थे। मैं काफी कमजोर हो रहा था, शरीर से भी और मन से भी। ऐसे में वानी साहब के परिवार के साथ अपने दिल की बातें साझा करके थोड़ी मजबूती मिलती थी। संकट के साथियों के संग दर्द का एक रिश्ता जो बन गया था।
सब्ज चाय पीकर मिली राहत
वानी परिवार के पास छोटा सा गैस सिलिंडर था। जिसपर वे कमरे में चाय बना लेते थे। उन्होंने मेरी हालत देखकर मुझे सब्ज चाय पीने को आफर की। सब्ज चाय यानी ग्रीन टी। वह भी ग्रीन टी नमक डालकर। यह पहाड़ के लोगों का लोकप्रिय पेय है। वे लोग मीठी चाय को लिप्टन टी कहते हैं जिसे वे पीना कम ही पसंद करते हैं। सचमुच सब्ज चाय पीकर काफी राहत मिली। शरीर में थोड़ी जान आई और दिमाग को भी सूकुन मिला।

28 साल के आफताब वानी काष्ठ शिल्पी हैं। वे अद्भुत कलाकार हैं। लकड़ी पर तरह तरह की कलाकृतियां बनाते हैं। वे अपनी कलाकृतियां लेकर सरस मेले में आए थे। अब सारा सामान नुमाइश मैदा में फंसा हुआ है। वहीं बड़े भाई गुलाम रसूल वानी का लकड़ी की कंघियां बनाने का कारोबार है। वे हर महीने एक बार श्रीनगर अपनी लकड़ी की कंघियों की सप्लाई देने आते हैं। इन लकड़ी की बनी कंघियों की खास बात वे बताते हैं कि इनसे लगातार कंघी करने से आपके बालों को शेंपू कंडीशनर जैसी चीजों की कोई जरूर नहीं रह जाती है। साथ ही आपके बाल भी देर से सफेद होते हैं। एक लकड़ी की कंघी अमूमन 20 रुपये के आसपास आती है। गुलाम रसूल वानी साहब के बड़े बेटे दिल्ली में हैं। हामिद रसूल वानी जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे हैं। वानी परिवार एक टेंपो ट्रेवलर गाड़ी लेकर आया है जो सड़क पर खड़ी है।
हर सरस मेले में इनका परिवार नहीं आता था।  पर इस बार उन्होंने अपनी पत्नी और बेटे को श्रीनगर घूमाने की सोच ली थी इसलिए पूरा परिवार साथ आ गया था। हमारे बेटे अनादि को इस संकट की घड़ी में  कामरान और हसन जैसे दो दोस्त मिल गए थे जिनके साथ खेलते हुए उसका वक्त कट जाता था।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

No comments:

Post a Comment