Wednesday, August 27, 2014

सदभावना का शहर - बरेली ((42))


( पहियों पर जिंदगी 42)
3 नवंबर 1993  हमारी ट्रेन सुबह बरेली रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर है। बरेली उत्तर प्रदेश के रोहिलखंड क्षेत्र में आता है। यह कभी रोहिला नवाबों की राजधानी हुआ करती थी। महाभारत काल में यह अहिक्षत्र ( पांचाल ) क्षेत्र कहलाता था।

आपने फिल्म मेरा साया का लोकप्रिय गीत तो सुना ही होगा- झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में । लोग कहते हैं कि बरेली झुमके के लिए भी प्रसिद्द है। पुरानी फिल्मों एक और गीत में बरेली के झुमके की चर्चा आती है। कजरा मुहब्बत वाला की ये पंक्तियां झुमका बरेली वाला..अंखियों में ऐसा डाला...झुमके ने ले ली मेरी जान.... हालांकि मुझे यहां झुमके के बारे में कुछ पता नहीं चला। पर ये शहर सांप्रदायिक सद्भवाना के लिए प्रसिद्ध है। अपनी तहजीब के लिए जाना जाता है। यहां प्रसिद्ध मुस्लिम तीर्थ खानकाहे नियाजिया है। मुगल शासकों के समय बरेली फौजी नगर था। यहां तभी से फौजी छावनी है। विश्व प्रसिद्ध कथावाचक और नाटककार राधेश्याम कथावाचक भी बरेली से हुए हैं।


सदभावना का केंद्र - चुन्ना मियां का मंदिर
बरेली की पहचान एक ऐसे मंदिर से है जो सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है। शहर में एक ऐसा मंदिर है जिसे एक मुस्लिम परिवार ने बनवाया है। ऐसा उदाहरण देश में बहुत कम मिलेगा।
बरेली के सेठ फजल उर्र रहमान ऊर्फ चुन्ना मियां ने यहां पर भगवान विष्णु का लक्ष्मी- नारायण मंदिर का निर्माण कराकर हिंदू- मुस्लिम एकता की एक मिसाल कायम की। ये मंदिर खोखरा पीर इलाके में कटरा मामराई में है। इसके ठीक बगल में बुधवारी मस्जिद भी है। इस इलाके में पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों को बसाया गया था। 

इस मंदिर का इंतजाम आज भी उनके परिवार के मोहम्मद अतिकुर रहमान साहब देखते हैं। सुबह की पूजा समय अक्सर वे मौजूद रहते हैं। सारे सदभावना रेल यात्री दोपहर में इस मंदिर को देखने गए। हमारे दोपहर के भोजन का इंतजाम इसी मंदिर की ओर से था। बरेली गंगा जमुनी तहजीब का नायब उदाहरण वाला शहर है। 


बरेली में हिंदू राजा मकरंद राय ने विशाल मस्जिद का निर्माण कराया तो चुन्ना मियां से मंदिर बनवाया। पूरा शहर इसे चुन्ना मियां के मंदिर के नाम से ही जानता है। चुन्ना मियां ने इस मंदिर के निर्माण में सबसे ज्यादा एक लाख 10 हजार रुपये का योगदान किया। वे जयपुर से मूर्तियां खरीद कर लाए। साथ ही मंदिर के निर्माण के लिए अपना काफी वक्त दिया। इस मंदिर का उद्घाटन करने 16 मई 1960 में राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद आए थे। मंदिर में चुन्ने मियां का नाम सबसे ज्यादा दान देने वालों की सूची में लिखा हुआ है।

कहा जाता है चुन्ने मियां ने पहले मंदिर पास पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के खिलाफ जमीन अतिक्रमण का एक मुकदमा दायर किया हुआ था। पर हरिद्वार के एक संत से मुलाकात ने उनकी जिंदगी बदल दी। उन्होंने न सिर्फ मुकदमा वापस लिया बल्कि मंदिर निर्माण में मदद करने लगे।


शाम को हमारी मुलाकात राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक बनवारी लाल यादव जी से हुई। वे गांधी टोपी लगाते हैं। हमारी सदभावना ट्रेन देखकर वे कौतूहलवश हमसे मिलने आ गए। उन्होंने अपने सदभावना को लेकर विचार हमसे साझा किए और रेलयात्रा जैसे प्रयास की खूब तारीफ की। बरेली में हमारा पड़ाव सिर्फ एक दिन का था। सभी रेल यात्रियों को ये शहर इतना अच्छा लगा कि वे चाहते थे कि यहां एक दिन का और ठहराव होता तो अच्छा होता। 


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