Monday, August 25, 2014

पीतल नगरी मुरादाबाद में ((40))

( पहियों पर जिंदगी 40) 
1 नवंबर 1993  एक नई सुबह के साथ महीना बदल चुका है। अंगरेजी माह से देखें तो हम तीसरे महीने लगातार रेलगाड़ी में हैं। सुबह-सुबह हमारी ट्रेन उत्तर प्रदेश के मशहूर शहर मुरादाबाद में पहुंच चुकी है। मुरादाबाद देश भर में पीतल के कारोबार के लिए जाना जाता है। इसे पीतल नगरी भी कहते हैं। पीतल के बर्तन, धूप बत्ती और अगरबत्ती स्टैंड, कैंडिल स्टैंड और तमाम तरह के सजावटी पीतल के सामान यहां बनते हैं। साथ ही बड़ी मात्रा में दुनिया के अन्य देशों में निर्यात किए जाते हैं।

नहीं जा सका अमरपुरकाशी - नेहरु युवा केंद्र के समन्वयक रामरक्षा सिंह के कार्यालय में सद्भावना रेल यात्रियों का पहला स्वागत हुआ। हमारा कार्यक्रम पहले से तय है। पास के गांव अमरपुर काशी जाने का। रात्रि विश्राम भी अमरपुर काशी गांव में  ही है। पंजाब की रावी और गुरप्रीत बीमार हो गई हैं। मेरे पास दफ्तर का काम फैला पड़ा है। इसलिए मैं भी अमरपुर काशी नहीं जा सका। आज मैंने कई सारे दफ्तर के मैटर इलेक्ट्रोटाइप कराए। इसके साथ ही रेलयात्रा के दौरान ली गई तस्वीरों के प्रिंट भी निकलवाए। रेलयात्रियों के साथ नहीं जाने पर मुझे भोजन के लिए रेलवे स्टेशन की कैंटीन या फिर आसपास के ढाबे या रेस्टोरेंट का आसरा लेना पड़ता है।
 मुरादाबाद बहुत भीड़भाड़ वाला शहर है। रेलवे स्टेशन के आसपास का इलाका ज्यादा सुंदर नहीं दिखाई देता। कुछ रेल यात्रियों ने शहर जाकर अपने लिए प्रतीकात्मक पीतल के कुछ सजावटी सामानों की खरीददारी भी की। शहर के कई लोग हमारी सद्भावना रेल को देखने आ रहे हैं। वे रेलगाड़ी को बड़े कौतूहल से देख रहे हैं। अलग अलग डिब्बों पर लिखे संदेशों को पढ़ रहे हैं।



रेल यात्रा चूंकि रेल मंत्रालय द्वारा समर्थित है इसलिए हर रेलवे स्टेशन पर दोपहर में रेलवे बोर्ड की ओर से किसी अधिकारी का फोन आता है। रेलवे स्टेशन मास्टर के पास आए फोन को कई बार मुझे जाकर सुनना पड़ता है। वे रेलयात्रा के इंतजाम के बारे में पूछते हैं। वे स्टेशन पर मिलने वाली सुविधा के बारे में पूछते हैं। अगर हमने कोई शिकायत कर दी तो समझो उस स्टेशन के स्टेशन मैनेजर की खाट खड़ी हो गई। अक्सर सद्भवना यात्रा स्पेशल ट्रेन को रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर जगह दी जाती है ताकि दिन भर स्थानीय लोग इस ट्रेन को देखने आ सकें। क्योंकि ये 14 डिब्बों की ट्रेन अपने आप में अनूठी है। लोग कौतूहल वश इसे देखते हैं और सदभावना के संदेशों को पढ़ते हैं।


भोपाल, बरेली समेत सदभावना रेल यात्रा का अलग शहरों में स्वागत। 
ट्रेन के साथ एक चलती फिरती पुस्तक प्रदर्शनी भी है। प्रदर्शनी इंचार्ज ट्रेन रुकने पर अपने साहित्य की स्टाल प्लेटफार्म पर लगा देते हैं। इस स्टाल से आते जाते यात्री गांधी और सर्वोदय से जुड़ा साहित्य खरीदते हैं।
कई बार रेल यात्री जिन्हे किसी ट्रेन में अपने घर जाने के लिए आरक्षण नहीं मिल पाया है वे इतनी शानदार ट्रेन को देश भर में यूं ही घूमती हुई देखकर कोसते भी नजर आते हैं। मुरादाबाद में मुझे कुछ ऐसे लोगों का गुस्सा सुनने को मिला। 


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