Saturday, August 23, 2014

एक बार फिर शांतिकुंज हरिद्वार में ((38))

( पहियों पर जिंदगी 38)
30 अक्तूबर 1993  आध्यात्मिक नगरी हरिद्वार की सुबह आज सभी रेल यात्रियों को हरिद्वार में गंगा स्नान का मौका मिला है। हरिद्वार वह जगह है जहां गंगा नदी पहाड़ों से उतरकर मैदानी भाग में प्रवेश करती है। यहां गंगा स्नान करने के लिए विशाल घाट हर की पौड़ी ब्रिटिश काल का बना हुआ है। यहां गंगा का जल वाराणसी पटना की तुलना में ज्यादा निर्मल है।
हरिद्वार जंक्शन पर सुबह सुबह अचानक मैंने देखा कि एक सामने वाली ट्रेन से हमारे हाजीपुर के मित्र शिवपूजन कुमार, भारती भाभी और उनकी बहन सीता उतर रहे हैं। वे लोग शांति कुंज जाने के लिए आए हैं। 

शिवपूजन को विवाह के बाद उनके पिताजी शांतिकुंज जाकर संस्कार सीखने की प्रेरणा दी है। इसलिए वे कुछ दिनो तक शांतिकुंज की कुटिया में निवास करेंगे। फिलहाल आज शिवपूजन दिन भर हमारे साथ ही रहे।


हमारी आज की साइकिल रैली हर की पौड़ी होते हुए गोबिंदगढ़ धर्मशाला पहुंची। हमारा रात्रि भोजन वहीं पर है। भोजन के बाद हमलोगों ने शांतिकुंज के लिए प्रस्थान किया। हरिद्वार ऋषिकेश मार्ग पर शांतिकुंज गायत्री परिवार का मुख्यालय है। सभी सद्भावना यात्री शांति कुंज के विशाल सभा कक्ष में बैठे। यहां शांतिकुंज के ब्रजमोहन गौड़ ने स्वागत भाषण दिया। शांतिकुंज के लोग हरिद्वार में सद्भवना यात्रा के स्वागत के लिए पहले से ही तैयार थे। कुछ स्टेशन पहले शांति कुंज के प्रतिनिधि बलराम सिंह परिहार रेल यात्रा के दौरान हमारे पास आए थे। तब उन्होंने शांतिकुंज में हमारे कार्यक्रम की रुपरेखा तय की थी।

शांतिकुंज की संगीत मंडली द्वारा यहां प्रेरक गीत पेश किया गया। सोया जाग वीर बलिदानी जाग...कैसे बैठा है चुपचाप। मंच पर श्री वीरेश्वर उपाध्याय और सुब्बराव जी साथ बैठे हैं। वीरेश्वर उपाध्याय जी का बौद्धिक प्रवचन में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में भी सुन चुका हूं। वे इंजीनियरिंग का कैरियर छोड़ आध्यात्म की ओर प्रवृत हो गए हैं। शांतिकुंज न सिर्फ आध्यात्मिक संगठन है बल्कि देश में आपदा आने पर इसके स्वंयसेवक हर जगह सेवा के लिए भी पहुंचते हैं। वे हमारे सद्भावना के अभियान के प्रशंसक हैं।

शांतिकुंज भी मैं दूसरी बार पहुंचा हूं। पहली बार मैं उत्तर काशी शिविर से लौटने के बाद सुब्बराव जी के साथ ही यहां आया था। हालांकि गायत्री परिवार के संग हमारे परिवार का जुड़ाव बचपन से ही रहा है। सारे रेल यात्रियों शांति कुंज द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न प्रकल्पों को देखा, समझा और प्रेरणा ली। रात्रि भोजन यहीं पर था। हमलोग भोजन के बाद अपनी ट्रेन पर  हरिद्वार जंक्शन लौट आए। रात को हमारी ट्रेन ऋषिकेश के लिए खुली।



-vidyutp@gmail.com 

शांति कुंज की वेबसाइट पर जाएं - http://www.awgp.org/

( HARIDWAR, RISHIKESH, SHANTI KUNJ, LIFE ON WHEELS)
सदभावना रेल यात्रा का वृतांत शुरू से पढ़ने के लिए यहां पर क्लिक करें। 

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