Sunday, September 28, 2014

जब दरिया झेलम ने दिखाया अपना गुस्सा ((14))

( जन्नत में जल प्रलय - 14)

श्रीनगर शहर के लोग शनिवार छह सितंबर की रात इस उम्मीद के साथ सोए थे कि इतवार की सुबह खुशनुमा होगी। कई दिनों से लगातार हो रही बारिश रुक गई थी। अब उम्मीद थी मौसम खुशगवार होगा। आसपास के शहरों के रास्ते खुल जाएंगे और
बाग सैलानियों से गुलजार होंगे। पर रविवार के सुबह साढ़े तीन बजे का वक्त था जब सारा शहर गहरी नींद में था पर शहर के बीचों बीच गुजरती झेलम नदी के पानी में भंयकर शोर था। कई दिनों से कश्मीर के तमाम इलाकों में हुई बारिश के पानी को संभाल पाना महज 30 मीटर चौड़ाई वाली दरिया के लिए अब मुश्किल हो चुका था।

दरिया पर बना बांध तेज बहाव का दबाव नहीं सह सका। बांध टूटने के साथ ही तेज गति के साथ पानी शहर में घुसा। छह फीट ऊंची पानी की धारा तेज गति से शहर में घुसी। जिसकी भी नींद खुली उसने इस जल प्रलय का भयावह मंजर अपनी आंखों से देखा और चीखते हुए बिस्तर छोड़ उपरी मंजिलों की ओर भागने लगे। सैकड़ो लोग तो सोते सोते ही बह गए। पानी इतना तेज था कि दो घंटे में दो मंजिला इमारतें डूबा चुकी थीं। लोग तीसरी मंजिल की ओर भाग रहे थे। काफी लोगों ने छत पर शरण ली । कई लोग पेड़ पर चढ़ गए। साठ साल में किसी ने झेलम का ऐसा रौद्र रूप नहीं देखा था। सालों भर किसी नाले सी दिखाई देने वाली झेलम पूरे शहर पर अपना गुस्सा दिखा रही थी।


रविवार की दोपहर तक लाल चौक, टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर, जम्मू एंड कश्मीर बैंक की मुख्य इमारत सब डूब चुके थे। शहर का सबसे लोकप्रिय इटिंग प्वाइंट कृष्णा ढाबा शनिवार की रात को गुलजार था। पर अगली दोपहर तक कृष्णा ढाबा उसके आसपास के हिंदुस्तान पेट्रोलियम के दो पेट्रोल पंप डूब गए थे। दोपहर तक पूरे शहर की बिजली गुल हो गई। मोबाइल और टेलीफोन सेवाएं बंद हो गईं। धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला शहर कुछ ही घंटे में तबाह हो चुका था। रविवार की शाम शहर के सबसे चहलपहल वाले इलाके डल गेट में पानी उफान मारने लगा। पानी का बहाव इतना तेज था कि डल झील के कई शिकारे टूट कर दो टुकडे हो गए।

अब तक यह होता था कि डल झील में पानी बढ़ने पर उसे डल गेट नंबर एक से चैनल द्वारा झेलम में छोड़ा जाता था। अब उल्टा हो रहा था झेलम का पानी डल झील में आ रहा था और डल झील का स्तर बढ़ता जा रहा था। डल के किनारे के सभी होटल पानी में डूब चुके थे। पूरे शहर में कोहराम मचा था। लोग सुरक्षित जगहों पर जाने के लिए नावें ढूंढ रहे थे तो बड़ी संख्या में लोग जान बचाने के लिए डल झील के पास स्थित शंकराचार्य पर्वत पर चढ़ने लगे।
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