Friday, July 25, 2014

कैंप में जन नन होय रे ... आ गया अंबाला ((9))


( पहियों पर जिंदगी-9)
नई दिल्ली से आगे बढ़ने के बाद हमारी सजी धजी ट्रेन रात के 10 बजे अंबाला में रुकी। ये स्पेशल ट्रेन का एक तरह से पहला पड़ाव है। रात्रि भोजन की व्वस्था रेलवे स्टेशन पर ही है। सुरक्षा के कड़े इंतजाम के बीच अच्छी खासी भीड़ ने स्टेशन पर हमारा स्वागत किया। मैं कावेरी में हूं, तड़ित प्रकाश सिंधू कोच में। 

अंबाला स्टेशन पर उतरने के बाद सदभावना यात्रियों का उत्साह देखने लायक था। भोजन के इंतजार के दौरान 200 के करीब यात्री अपने अपने अंदाज में नृत्य करने लगे। कभी राष्ट्रीय गीत तो कभी क्षेत्रीय भाषा की कोई लोक धुन। कैंपों का प्रसिद्ध मजाकिया गीत कैंप में जन जन जन होय रे ...गाया गया। नागराज का उत्साह और अदाएं देखने लायक हैं। वह झूम कर नाच रहा है और दूसरों को भी अपने साथ नचा रहा। नागराज के बारे में थोड़ा सा बता दूं। ये सज्जन बेंगलुरू के रहने वाले हैं। पिता का चलता फिरता कारोबार छोड़कर फिल्मों में किस्मत आजमाने गए। कोई बड़ा ब्रेक नहीं मिल पाया। पर कन्नड़ की फिल्मों में कुछ छोटी मोटी भूमिकाएं मिलीं।

नागराज का दावा है कि उसने फिल्म अंधा कानून में रजनीकांत के साथ भी छोटी सी भूमिका की है। फिर फिल्मों में कुछ दाल नहीं गली तो समाज सेवा करने आ गए हैं। जनवरी 1992 में बेंगलुरू शिविर में सुब्बाराव जी के संपर्क में आए। अब पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए हैं। उन्हें रंग बिरंगे कपड़े पहनने का शौक है। इनके डिजाइन वे दर्जी को खुद देते हैं। खास तौर पर शर्ट में अलग अलग तरह की जेबें बनवाते हैं। मसलन कलम रखने के लिए डायरी के लिए आदि।

मैं दिल्ली आधार शिविर को थोड़ा मिस कर रहा हूं। वहां रेलवे स्टेडियम के बगल में रेलवे कर्मचारी शर्मा जी के चार बच्चे नीरज, धीरज, जलज और पंकज से दोस्ती हो गई थी। नीरज कहा था कि वह यात्रा में साथ चलेगा पर उसे छुट्टी नहीं मिल सकी। एक और दिल्ली का दोस्त बिट्टू जो करोलबाग के रहने वाले थे, कैंप में मुझसे मिलने आए। फिर अपने घर ले गए हरध्यान सिंह रोड पर। मैंने सदभावना यात्रा खादी का बना कुरता पहना हुआ था। उसे देखकर बिट्टू की बहनें खूब हंस रही थी।
09 अक्टूबर 1993
अंबाला शहर की सड़कों पर साइकिल रैली निकाली गई। कई स्थानों स्वागत और सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। आज की पहली रैली थी नीली नीली साइकिलों पर निकली। जब देश के कोने कोने से आए 200 नौजवान नारे लगाते हुए सड़कों पर चलते हैं तो लोग कौतूहल से देखते हैं। शाम की प्रार्थना सभा शहर के बाल भवन में हुई। यहां पर युवाशक्ति के संपादक आद्या प्रसाद उन्मत आए थे। हम इस पत्र को कई साल से पढ़ते आ रहे हैं।


अंबाला में आ गया दूसरा बैच - अंबाला में यात्रा के 10 दिन पूरे हो रहे हैं। यहां पर बैच नंबर 3 का आगमन और बैच नंबर एक की विदाई है। वैसे तो रेल यात्रा में हर किसी को कम से 20 दिनों का समय देना है पर बैच नंबर एक 10 दिनों का ही है। मैंने एक नंबर बैच वालों के लिए प्रमाण पत्र तैयार किए। इसके साथ ही नवागंतुक रेल यात्रियों का पंजीयन किया। दिन में अंबाला शहर के बाजार में जाकर दफ्तर के लिए जरूरी स्टेशनरी की खरीददारी भी की। रेल यात्रा में शामिल होने के लिए पंजीयन शुल्क 100 रुपये है। रेल यात्रियों के लेमिनेट फोटो लगा किया हुआ आई कार्ड दिया जाता है। लेमिनेट करने के लिए लेमिनेशन मशीन हमारे साथ है जो रवि नारायण जी ( ICYO ) खास तौर पर दे गए हैं। लेमिनेशन के लिए बिजली का प्वाइंट ढूंढने के लिए मैं स्टेशन मैनेजर के दफ्तर का इस्तेमाल करता हूं।




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