Friday, August 8, 2014

जलियांवाला बाग – यहां चलीं थी जनरल डायर की तोप ((23))


( पहियों पर जिंदगी -23 )19 अक्तूबर 1993  सुबह की हमारी रैली साइकिल से निकली। रेलवे स्टेशन से कुछ किलोमीटर चलने के बाद हमलोग खालसा कालेज अमृतसर में पहुंचे। पर कालेज में छुट्टियां होने के कारण परिसर में छात्र बहुत कम थे। यहां प्रिंसिपल साहब ने हमारा स्वागत किया। हमें यहां नास्ते में समोसा, मिठाइयां और चाय मिली। अटारी बार्डर की ओर जाने वाली सड़क पर स्थित खालसा कालेज की इमारत काफी भव्य है। 

इसके बाद हमलोग गुरूनानक देव विश्वविद्यालय के परिसर में पहुंचे। विश्वविद्यालय के मुख्य भवन के बाहर हरी हरी घास पर हमारा कार्यक्रम हुआ। राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम समन्यवयक बच्चन सिंह जी ने हमारा स्वागत किया। विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के विद्यार्थी भी यहां मौजूद थे।

विश्वविद्यालय से निकलकर शहर की भीड़ का सामना करते हुए हमलोग जलियांवाला बाग की ओर जा रहे हैं। जिस रास्ते से कभी जनरल ओ डायर की तोप जा रही थी उस रास्ते से हमारी सद्भावना की साइकिलें जा रही हैं। साइकिलें पार्क करने के बाद हमलोगों ने थोड़ी देर तक जलियांवाला बाग देखा। यहां तोप की गोलियों के निशान आज भी देखे जा सकते हैं। 

जनरल की तोपों ने यहां सभा कर रहे सैकड़ो हिंदुस्तानियों को भून डाला था। बाहर निकलने का एक ही संकरा रास्ता था जहां ब्रिटिश फौज पहले से जमा थी। लोगों को भागने का रास्ता नहीं मिला। बड़ी संख्या में लोग कुएं में कूद गए। वही शहीदी कुआं आज भी देखा जा सकता है। बाग के चारों तरफ ऊंची ऊंची इमारते हैं। जलियांवाला बाग ब्रिटिश भारत के जुल्म की दास्तां की सबसे लोमहर्षक तस्वीर पेश करता है। अब यहां शहीदों की स्मृति में सुंदर स्तंभ बना है। इसी स्तंभ के नीचे हमारी छोटी सी सभा हुई। यहां से हमलोगों ने पैदल ही स्वर्ण मंदिर के लिए प्रस्थान किया।

दोपहर में अचानक रणसिंह भाई हमारे पास आए और बोले तुम्हारी जेब में कुछ रुपये हैं। मैं समझ गया उन्हें पीसीओ से कुछ जरूरी फोन करने हैं। हमलोग पास के पीसीओ पहुंच गए। रणसिंह भाई साहब मुझे कहते हैं कि सदभावना रेल यात्रा के कार्यालय के प्रभारी हो तो ट्रेन में ही रहो और दफ्तर का काम करो। लेकिन मैं उनसे तर्क करता हूं कि मैं देश घूमने के लिए निकला हूं। इसलिए घूमने के बाद मैं दफ्तर का काम निपटाऊंगा। हालांकि कई बार काम के दबाव में मुझे कुछ कार्यक्रम छोड़ना भी पड़ता है। 


अमृतसर के जलियांवाला बाग में मारेन, सेंड्रा, रणसिंह परमार भाई साहब, दिलीप और मैं।

हमारी शाम की सभा तंग गलियों से होती हुई एमएलए फकीरचंद शर्मा के आवास पर पहुंची। यहीं सड़क पर सर्वधर्म प्रार्थना सभा हुई। 

और हमने कर दिया विद्रोह - यहां पर खाने के लिए काफी इंतजार करना पड़ा। इसी देरी के बीच रेल यात्रा की लड़कियों ने विद्रोह कर दिया। उनका कहना था कि देश भर से रेलयात्री यहां पहुंचे हैं फिर एमएलए फकीरचंद शर्मा के परिवार के लोग हमारे स्वागत में बाहर क्यों नहीं आए। हमारी सहयात्री रेल यात्री अमनजोत कौर जो पंजाब के संगरूर से कांग्रेस के एमएलए सरदार जसबीर सिंह की बेटी हैं। उसने बात को आगे बढ़ाया। इस मुद्दे ने आग में घी की तरह काम किया और हमने फकीरचंद शर्मा की मेहमानवाजी का बहिष्कार किया और बिना खाए पीए रेलवे स्टेशन वापस आ गए। रेलवे स्टेशन के बाहर ही हमने सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया। बाद में फकीरचंद शर्मा ने शिविरार्थियों का भोजन रेलवे स्टेशन पर ही भिजवा दिया।

बाद में मेरी फकीरचंद शर्मा जी से बात हुई वे इस अव्यवस्था को लेकर शर्मिंदा थे। वे सुब्बाराव जी के पुराने परिचित हैं, इसलिए वे बड़ी सादगी के साथ इस यात्रा में हमारी मेजबानी में जुटे हैं।

वापसी की बात की पर नहीं बनी बात - यात्रा में हमारे बीस दिन पूरे हो गए हैं। अमृतसर से ही हम वापस घर जाना चाहते थे लेकिन रणसिंह भाईसाहब चाहते हैं कि मैं आगे तक चलूं इसलिए हमने यात्रा में विस्तार दिया। वहीं भाई जी जाने की बात पर पूछते हैं, इससे अच्छी पढ़ाई और कहां हो सकती है...कई साल बाद ये सोच कर लगता है वे बिल्कुल सच कहते थे। साढे आठ महीने में पूरा देश घूमना और आपकी जेब से एक रुपया भी खर्च नहीं हो। साथ ही देश की सभ्यता संस्कृति को करीब से देखना, सचमुच इससे अच्छी पढ़ाई और कहां हो सकती है। 




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