Wednesday, August 6, 2014

श्रीदरबार साहिब के शहर अमृतसर में ((21))


(पहियों पर जिंदगी 21 ) 
18 अक्तूबर 1993- जालंधर से रात को खाने-पीने के बाद चलने के बाद रात्रि एक बजे हमारी ट्रेन अमृतसर रेलवे स्टेशन पहुंच चुकी थी। सुब्बराव जी के स्वागत में रेलवे के डीआरएम और अन्य अधिकारी यहां पहुंचे हैं। रात को जो नौजवान जगकर बाहर आए उन्हें फिर कोल्ड ड्रिंक पिलाई गई। आनंद भाई साहब ने रेलवे अधिकारियों को शिकायत दर्ज कराई। हमलोग कोल्ड ड्रिंक से होने वाली हानि के खिलाफ लोगों को जागरूक करते हैं फिर हमें कोल्ड ड्रिंक क्यों। हमारी शिकायत सुनी गई। आगे से हमें दूध पिलाई जाएगी। सुबह अमृतसर के स्थानीय एमएलए फकीरचंद शर्मा और नेहरू युवा केंद्र संगठन के लोग भी स्वागत के लिए पहुंचे। 

दुर्गायाणा मंदिर में नन् हे लंगर
नास्ते के बाद हमारी रैली दुर्ग्याणा मंदिर पहुंची। बड़े से सरोवर के बीचों बीच दुर्ग्याणा मंदिर है। यह मंदिर भी स्वर्ण मंदिर की तर्ज पर ही बना है। सरवोर के चारों कोने में भी मंदिर हैं। बीच में मुख्य मंदिर है। यहां भी सुबह शाम लंगर लगता है। मंदिर परिसर में रंगबिरंगी टोपियां बिक रही थीं। गगन ने एक टोपी खरीद कर मुझे गिफ्ट किया। मैं भी एक टोपी पहन कर खुश हो रहा हूं।

दुर्गयाणा मंदिर में बच्चे बने नन्हें लंगूर -  नवरात्र शुरू हो चुका है। इस कारण दुर्गायाणा मंदिर में चहल पहल बढ़ी हुई है। यहां पर हमें नन्हें बच्चे लंगूर का रूप धारण किए मंदिर परिसर में चहल कदमी करते नजर आए। पंजाब के साथियों से पूछने पर पता चला कि पंजाब में लोग खास तरह की इच्छा पूरी करने के लिए मनौतियां मांगते हैं। अगर मन्नत पूरी हो गई तो अपने बच्चों को लंगूर बनाकर अमृतसर के दुर्गयाणा मंदिर में घुमाते हैं। यानी हनुमान जी का भी इस मंदिर से पुराना रिश्ता है।मनौतियां कई तरह की होती हैं पर लंगूर बनाने वाली पहली बार देखी और सुनी। तो हमें जगह जगह लंगूर के रूप में बच्चे दिखाई दिए। 



बंगलूरू से आई मुस्लिम युवतियों सलमा और उनकी सहेलियों को भी दुर्गायाणा मंदिर परिसर का माहौल काफी पसंद आया। दोपहर में हमारी रैली दूसरे मार्ग से रेलवे स्टेशन लौट आई।

वाघा यानी भारत पाकिस्तान की सीमा पर- 

शाम को हमलोग बसों से भारत पाकिस्तान की सीमा अटारी बार्डर के लिए चल पड़े। अटारी अमृतसर से 26 किलोमीटर है। अटारी सीमांत रेलवे स्टेशन का नाम है जबकि बार्डर का नाम वाघा है। अटारी से पाकिस्तान के शहर लाहौर के लिए ट्रेन जाती है। वाघा सीमा पर शाम को प्रतिदिन भारत और पाकिस्तान के झंडे उतारने की रस्म अदा की जाती है। दोनों देशों के सैनिक झंडा उतारने से पहले अपनी अपनी राष्ट्र धुन बजाते हैं। इस दौरान सैनिक एक दूसरे से रस्मी मुलाकात करते हैं। दोनों तरफ से सीमा से 20 फीट की दूरी पर दोनों देशों के नागरिकों की भारी भीड़ जुटती है। दोनों देशों के नागरिक एक दूसरे के अभिवादन में हाथ उठाते हैं। पर ये हाथ मिल नहीं पाते हैं। पाकिस्तान का शहर लाहौर यहां से बहुत निकट है।


सीमा पर हमलोगों की छोटी सी सभा भी हुई। आते समय बस में नए रेल यात्रियों से परिचय हुआ। मैं अटारी के लिए गई अलग बसों में से एक बस का प्रभारी था। संगरूर से आई गुरप्रीत सैनी और वीना बंसल वाघा सीमा पर सैनिकों की परेड देखकर काफी खुश थीं। सीमा पर फौजियों की ये परेड देश भर से आए लोगों में राष्ट्र भक्ति का नया जोश भरती है। हमने भारत पाकिस्तान सीमा के बीच पहली बार नो मेन्स लैंड भी देखा।

रात भर जग कर काम - रात के भोजन के बाद ट्रेन में पहुंचने के बाद मुझे देर रात तक जग कर काम करना पड़ा। क्योंकि अमृतसर रेल यात्रियों का ज्वाएनिंग और रिलिविंग स्टेशन है। यहां पर सौ नए लोग आए और सौ पुराने लोग गए। पुराने लोगों को प्रमाण पत्र, टीए बिल आदि जारी करना और नए लोगों का पंजीयन और उन्हे आईकार्ड आदि जारी करना बहुत जिम्मेवारी का काम है।



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